भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई )का दोगलापन

 24 May 2018  945

मुंबई, (24 मई 2018)- सालाना 1800 करोड़ की आय कमानेवाली भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई ) को सूचना का अधिकार के दायरे में लाने की सिफारिश भारत के विधि आयोग ने की हैं। जिसपर बीसीसीआई ने सूचना का अधिकार कानून का विरोध कर रही हैं। यह वहीं बीसीसीआई हैं जो मैदान निर्माण और मैचों के लिए हर एक राज्य सरकार से टैक्स में छूट पाने के लिए नतमस्तक होती हैं और अब निजी संस्था होने का दावा कर रही थी। विधि आयोग की सिफारिश पर केंद्र सरकार कौनसी भूमिका लेती हैं, यह देखना महत्वपूर्ण हैं। विश्व क्रिकेट पर साम्राज्य चलनेवाले और सबसे अमीर बोर्ड ऐसीख्याति प्राप्त अधिराज्य क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पर (बीसीसीअाई) शिकंजा कसने के लिए बीसीसीअाई को सूचना का अधिकार (अारटीअाई) कानून के दायरे में लाया जाए, ऐसी सिफारिश भारत के विधि अायोग ने की हैं।  इतना ही नहीं बीसीसीअाई से जुड़ी सभी राज्य संगठनों को आरटीआई के दायरे में लाने की सिफारिश विधि आयोग ने कानून मंत्रालय को भेजे हुई सिफारिश में की हैं। इस सिफारिश के बाद स्वाभाविक हैं कि बीसीसीआई ने नाराजगी जताते हुए विरोध शुरु कर दिया हैं। लेकिन अब यहीं बीसीसीआई सरकार से टैक्स में छूट लेने में सबसे आगे रहती हैं। सूचना का अधिकार के दायरे में न आने के लिए प्रयास करते हुए अपरोक्ष तौर पर पादर्शकता और स्वच्छ कामकाज का विरोध कर रही हैं। सरकार यंत्रणा के व्यवहार में पारदर्शकता आए,, भ्रष्टाचार ख़त्म हो, प्रशासकीय कार्यपद्धती, नियम तथा अन्य सरकारी काम में अनियमितता को स्थान न मिले, सरकारी कार्यपद्धती पर आम लोगों को संदेह न हो और उनके काम  बिना देरी, सरलता होने के लिए सूचना का अधिकार कानून बनाया गया।  भारत में क्रिकेट के मामले में बीसीसीअाई की हुक्मशाही होने से इसपर किसी का नियंत्रण नहीं हैं। मैदान का निर्माण और मैचों के लिए हर एक राज्य से बीसीसीअाई को टैक्स में छूट मिलती हैं। बीसीसीअाई की कमाई बड़े पैमाने पर हैं। इससे उनके कामकाज में सुसूत्रता लाने के लिए बीसीसीअाई को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाने की जरुरत होने का जिक्र विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में किया हैं।  भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) को ‘‘शासन का अंग’’ बताते हुए विधि आयोग सिफारिश की क्रिकेट बोर्ड को सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए. आयोग ने कहा कि यह लोक प्राधिकार की परिभाषा में आता है और यह सार्वजनिक जांच से बच नहीं सकता. आयोग ने सिफारिश की है कि बीसीसीआई को ‘‘निजी संस्था’’ माना जाता है, लेकिन इसे जवाबदेह बनाया जाना चाहिए. आयोग ने कहा कि इसे ‘‘हजारों करोड़ों रुपयों’’ की कर छूट और भूमि अनुदानों के रूप में सरकारों से ‘‘अच्छा खासा वित्तीय लाभ’’ मिला है. सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2016 में आयोग से इस बारे में सिफारिश करने के लिये कहा था कि क्रिकेट बोर्ड को सूचना का अधिकार कानून के तहत लाया जा सकता है या नहीं. पारदर्शिता लाने के लिए मालामाल क्रिकेट बोर्ड को आरटीआई के तहत लाने की लंबे वक्त से मांग होती रही है. विधि मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट में विधि आयोग ने कहा है कि बीसीसीआई को संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘ शासन ’ की परिभाषा के तहत लाया जाना चाहिए। इससे पहले भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड  (बीसीसीआई ) को सूचना का अधिकार कानून के तहत आने में आपत्ति थी। लेकिन रिटायर्ड जज मुकुल मुदगल की अध्यक्षता वाली कमिटी ने राष्ट्रीय क्रीडा विकास विधेयक का ड्राफ्ट केंद्रीय क्रीडा मंत्रालय को पेश किया था तब उस ड्राफ्ट की धारा के अनुसार सिर्फ सूचना का अधिकार कानून का स्वीकार करनेवाली राष्ट्रीय क्रीडा संगठनों को अपने नाम में भारत का जिक्र करने का अधिकार मिलेगा, इसे स्पष्ट किया था। इससे मुदगल कमिटी ने सिफारिश किए हुए राष्ट्रीय क्रीडा विकास विधेयक केंद्र सरकार द्वारा स्वीकारा गया तो ‘बीसीसीआई’ को अपने नाम से ‘इंडिया’ शब्द को निकालना होगा या उसे सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आना होगा। साथ ही में सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आने पर भारतीय क्रिकेट टीम को अधिकृत तौर पर भारत की टीम के तौर पर खेलने की अनुमति नहीं होगी। बीसीसीआई को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाने का कोशिश यूपीए सरकार से ही शुरु हुई थी। जुलाई २०१६ में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में कोर्ट ने विधि आयोग से बीसीसीआई सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आ सकेगा क्या? ऐसा सवाल पूछा था।  इसके बाद आज डेढ़ साल के बाद विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट कानून मंत्रालय को सौंपी हैं। बीसीसीआई निजी संस्था नहीं हैं। वह सार्वजनिक काम करने से कानून के दायरे में आती हैं।  इस संस्था ने जबाबदेही होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार बीसीसीआई सार्वजनिक संस्था हैं। इससे बीसीसीआई ने अपने रोजमर्रा व्यवहार की जानकारी जनता को दे और इसे और पारदर्शी बनना चाहिए। आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई सार्वजनिक काम करने से भारतीय संविधान की धारा २२६ नुसार यह संस्था कोर्ट के अधिकार के दायरे में आती हैं और जनता के प्रति उत्तरदायी हैं, ऐसा निर्देश हाल ही में दिया हैं। बीसीसीआई के प्रशासन में सुधार करवाने के लिए लोढा कमिटी ने सूचित किए अधिकाधिक सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी हैं। इसमें कोर्ट ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) को वैधता प्रदान करने के मामले में निर्णय लेने का अधिकार संसद को प्रदान किया हैं। कोर्ट ने बोर्ड का कामकाज आरटीआई के दायरे में लाने का निर्णय संसद पर छोड़ा हैं। लोढा कमिटी ने बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाने की कोशिश की थी। अब पारदर्शकता लाने के लिए बीसीसीआई को स्वयं से पहल करने की जरुरत हैं या मैदान का निर्माण और मैच के लिए हर एक राज्य से बीसीसीआई ने जो टैक्स में छूट ली हैं उसे ब्याज के साथ लौटाने की दिलेरी दिखानी होगी।