परीक्षा कराई जाएंगी या नहीं यह फैसला यूजीसी करेगा- सुप्रीम कोर्ट

 10 Aug 2020  705

देश/विदेश, (10 अगस्त 2020)- कोरोनावायरस महामारी के बीच यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में अंतिम वर्ष की परीक्षाएं आयोजित करना एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। कोरोना काल में यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में अंतिम वर्ष की परीक्षाओं को रद्द करने की याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर से सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान यूजीसी ने दिल्ली और महाराष्ट्र सरकार के अंतिम वर्ष की परीक्षा रद्द करने के फैसले पर सवाल उठाए हैं। यूजीसी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि परीक्षा आयोजित की जाएंगी या नहीं, यह फैसला यूजीसी ही कर सकता है, क्योंकि सिर्फ यूजीसी ही डिग्री प्रदान कर सकता है। कोर्ट ने यूजीसी से इस मसले पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 14 अगस्त को की जाएगी।
सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार ने अदालत को बताया कि उसने डीयू के अपने कॉलेजों में परीक्षा रद्द करने का फैसला किया है, वहीं, दूसरी ओर महाराष्ट्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि 13 जुलाई को स्टेट डिजास्टर मैंनेजमेंट अथॉरिटी ने प्रस्ताव पास किया है कि परीक्षा ना कराई जाएं। इसपर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह छात्रों के हित में नहीं होगा कि परीक्षा ना हों। वहीं, पिछली सुनवाई में केंद्र और यूजीसी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया था कि गृह मंत्रालय के दृष्टिकोण से वह न्यायालय को अवगत करायेंगे। मेहता ने यह भी कहा था कि वे अंतिम वर्ष की परीक्षाओं को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि देश में 800 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में से 209 ने परीक्षा प्रक्रिया पूरी कर ली हैं, उन्होंने कहा था कि इस समय करीब 390 विश्वविद्यालय अंतिम वर्ष की परीक्षायें आयोजित करने की तैयारी कर रहे हैं। पिछली सुनवाई में फाइनल ईयर परीक्षाओं पर याचिकर्ता की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट से कहा था कि अप्रैल के महीने में जारी हुई गाइडलाइन्स को यूजीसी (UGC) ने जुलाई के महीने में बदल दिया है। इस पर कोर्ट ने कहा था कि यूजीसी को ऐसा करने का अधिकार है और वो ऐसा कर सकते हैं। इस पर सिंघवी ने कहा था कि जुलाई में जारी हुई गाइडलाइन्स अप्रैल वाली गाइडलाइन्स से भी ज्यादा सख्त हैं, उन्होंने कोर्ट में यह भी कहा कि देश में कई सारे ऐसे विश्विद्यालय हैं, जहां ऑनलाइन परीक्षाओं के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। सिंघवी की इस दलील पर कोर्ट ने कहा था कि यूजीसी की गाइडलाइन्स में परीक्षाएं ऑफलाइन देने का भी विकल्प है। इसपर सिंघवी ने कहा था कि लेकिन बहुत से लोग स्थानीय हालात या बीमारी के चलते ऑफलाइन परीक्षा नहीं दे पाएंगे, उन्हें बाद में परीक्षा देने का विकल्प देने से और भ्रम फैलेगा। सिंघवी की इस दलील पर कोर्ट ने कहा था कि ये फैसला तो छात्रों के हित में ही दिखाई दे रहा है। वहीं, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया था, जिसमें कहा गया था कि फाइनल ईयर की परिक्षाएं 30 सितंबर तक आयोजित करवाने का मक़सद छात्रों का भविष्य संभालना है, ताकि छात्रों के अगले साल की पढ़ाई में कोई रुकावट न आए। आगे कहा गया था कि टर्मिनल वर्ष के दौरान अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए परीक्षाएं आयोजित कर के उनके द्वारा अध्ययन किए गए "विशेष इलेक्टिव पाठ्यक्रमों का परीक्षण करना आवश्यक है। यूजीसी ने अपने जवाब में याचिकर्ताओं और विभिन्न राज्य सरकार की चिंताओं को पर्याप्त रूप से संबोधित किया था। कोर्ट से सभी याचिकाओं को खारिज करने की मांग हलफनामा में की थी। यूजीसी ने कहा था कि टर्मिनल परीक्षा का आयोजन एक समय संवेदनशील मुद्दा है और एचआरडी के दिशा- निर्देशों का पालन करके विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श के बाद ये परीक्षाएं कराने निर्णय लिया गया था।