हमारे दद्दा यानी हॉकी के जादूगर ध्यानचंद। हर भारतीय को उन पर नाज है। आजादी से पहले भारत ने लगातार 3 ओलंपिक में हॉकी में स्वर्ण पदक जीता। उसमें दद्दा की हॉकी कलाकारी का किरदार सबसे अहम रहा। अपनी इसी कलाकारी से ध्यानचंद ने जर्मनी के एडोल्फ हिटलर जैसे जिद्दी शासक तक को अपना मुरीद बना लिया था।
दुनिया में हॉकी में ध्यानचंद को वही मुकाम हासिल है, जो क्रिकेट में डॉन ब्रैडमैन को और फुटबॉल में पेले को है। आज अपने दद्दा यानी हॉकी के 'जादूगर' मेजर ध्यानचंद का 110वां जन्मदिन है। 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में राजपूत परिवार में जन्में ध्यानचंद मात्र 16 साल की उम्र में ही ब्रिटिश आर्मी में भर्ती हो गए थे। उन्हें हॉकी से पहले ही लगाव था।
1948 में अपना अंतिम अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले ध्यानचंद ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में 400 से भी ज्यादा गोल दागे हैं। उनके जन्मदिन पर पेश है इस महान खिलाड़ी के करियर से जुड़ी 10 बेहद खास बातें।
1. ध्यानचंद को 'चंद' की संज्ञा देने के पीछे एक कहानी है। दरअसल, ड्यूटी पूरी करने के बाद वह रात को मैदान में हॉकी की प्रैक्टिस किया करते थे। उस वक्त स्ट्रीट लाइट की कोई व्यवस्था न होने के चलते वह अंधेरे में ही प्रैक्टिस किया करते थे। बावजूद इसके वह गेंद को आसानी से हिट कर देते थे। चंद को हिंदी में चंद्रमा कहा जाता है। उनकी इसी महारथ पर उनके दोस्तों ने उन्हें 'चंद' कहना शुरू किया, इसके बाद यह उपमा उनके नाम के साथ भी जुड़ गया।
2. 1928 के ओलंपिक में ध्यानचंद एमस्टरडेम ओलंपिक में सर्वश्रेष्ठ गोल करने वाले खिलाड़ी बने थे। उन्होंने कुल 14 गोल दागे। भारत की ऐतिहासिक जीत के बाद अंग्रेजी मीडिया ने इसका श्रेय ध्यानचंद को कुछ इस तरह दिया था, "यह हॉकी का खेल नहीं बल्कि जादू था, जिसे ध्यानचंद ने मुमकिन कर दिखाया।"
3. हॉकी के जादूगर ध्यानचंद से जब तत्कालीन मीडिया ने हॉकी में उनके सबसे खास और यादगार मैच के बारे में पूछा था तो उन्होंने बड़े ही सरलता से जवाब दिया, कि "मेरे लिए सभी मैच खास थे, लेकिन 1933 में बेटन कप में कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच खेला गया फाइनल मुकाबला सबसे रोचक रहा था।"
4. सिर्फ ध्यान चंद ही नहीं उनके भाई रुप सिंह भी हॉकी के बड़े खिलाड़ी थे। 1932 में ग्रीष्मकालीन ओलंपिक हॉकी फाइनल मुकाबले में भारत ने यूएसए को रिकॉर्ड 24-1 से कड़ी शिकस्त दी थी। इसमें ध्यानचंद ने 8 गोल दागे थे जबकि रुप सिंह ने 10 गोल किए।
5. बात 1936 में बर्लिन ओलंपिक की है। भारत पहले मैच के बाद शानदार फॉर्म में था। लोग उस वक्त हॉकी की बजाय अन्य खेलों जैसे क्रिकेट और फुटबॉल में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे थे। उस वक्त एक जर्मन अखबार ने बैनर हेडलाइन दी, "ओलंपिक में जादूगरी शो।" उस वक्त भारत के हर मैच से बर्लिन में पोस्टर लगे थे, "हॉकी स्टेडियम जाइए और भारतीय जादूगर ध्यानचंद की जादूगरी देखिए।"