"मुख्यमंत्री साहब आज मुझे न्याय मिला" ऐसा कहने को कई लोग हैं बेताब ...
10 Feb 2018
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► 28 सालों से इसी आस में हैं सिनेमॅटोग्राफर नरेन कोंड्रा
अनिता शुक्ला
मुंबई, (10 फरवरी 2018)- मंत्रालय में हर महिने के पहले सोमवार को ऑनलाइन होनेवाले लोकशाही दिन में राज्य के सामान्य नागरिकों की शिकायतों को संज्ञान में लेकर उसका तत्काल हल निकाला जाता है। बीते सोमवार को सोलापुर के चनबसप्पा घोंगडे ने उनकी शिकायतों पर कार्यवाही होने के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का अभिनंदन करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री साहब आज मुझे आप से न्याय मिला. लेकिन महाराष्ट्र में चनबसप्पा घोंगडे जैसे लाखों लोग हैं, जो अभी-भी न्याय पाने की बाट जो रहे है। जिनको भी मुख्यमंत्री साहब आज मुझे न्याय मिला बोलने का मौका चाहिए। बता दें कि, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता सिनेमॅटोग्राफर नरेन कोंड्रा पिछले 28 सालों से अपने हक के लिए और तो और खुद मुख्यमंत्री द्वारा अवार्ड में दिए घर को पाने के लिए दर-दर की ठोंकरे खा रहे है।
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता नरेन कोंड्रा को तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण ने साल 1989-90 में सरकारी कोटे से घर मंजूर किया था, जिसका कब्जा पाने की राह कोंड्रा पिछले 28 सालों से देख रहे है। लेकिन सरकारी अधिकारियों के चंगुल में फंसे घर का कब्जा कोंड्रा को पाने के लिए भारी मुश्किलें उठानी पड़ रही है। हालांकि घर का कब्जा पाने के लिए कोंड्रा ने अब तक पांच-छह मुख्यमंत्रियों से भी मुलाकात की। परंतु उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ और हासिल नहीं हुआ। बता दें कि तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण ने कोंड्रा को कांदिवली स्थित पटेलनगर में 520 स्क्वेयर फुट का घर अवार्ड में दिया था, और उससे संबंधित पत्र भी कोंड्रा को भेजा गया था। उसके बाद उन्होंने सरकारी कार्यवाही करने के लिए हर उस सरकारी कार्यालय के चक्कर काटें।
कोंड्रा जब भी अवार्ड में मिले घर को रोज कांदिवली में जाकर देखते तो उन्हें अपनी आंखों के सामने अपने घर को बनते देखकर खुशी का अनुभव होता था। इस अनुभव को हमेशा महसूस करने के इरादे से मंत्रालय जाकर घर से संबंधित सारी कागजी प्रक्रियाएं मंत्रालय जाकर पूरी की, तो अधिकारियों ने 15 दिन के बाद वापस बुलाया। 15 दिन के बाद वह 20 दिन के बाद आना कहते थे। इसी तरह टालमटोल करते-करते अब 28 साल से ज्यादा बीत चुके है। लेकिन सरकारी अधिकारी और बिल्डरों की साठगांठ के वजह से आज 28 साल बाद भी वो अपने सपनों का घर मिलेगा, इस आस में चक्कर काट रहे है। बता दें कि पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया से सिनेमॅटोग्राफर का कोर्स करके कोंड्रा पिछले तीन दशक से इस क्षेत्र में कार्यरत हैं, और उन्होंने श्याम बेनेगल, सईद मिर्जा, लेख टंडन, किरण नगरकर जैसे दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया। इसके साथ ही उन्होंने बहुत सारे विज्ञापन एवं फिल्मों के लिए काम किया। सईद मिर्जा के निर्देशक में बनी फिल्म रिक्शापुलर्स ऑफ मध्यप्रदेश नामक फिल्म के लिए कोंड्रा को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें कई अन्य पुरस्कारों से भी नवाजा गया हैं। लेकिन अपने ही हक का घर पाने के लिए कोंड्रा को पिछले 28 सालों से दर-दर की ठोंकरे खानी पड़ रही हैं। एक ओर जहां राजनेताओं और उनके करीबियों समेत पत्रकारों के नाम एक से अधिक फ्लैट दिए जाने का विषय उजागर होने के बाद मुख्यमंत्री के कोटे से फ्लैट देने की योजना पर कोर्ट ने पाबंदी लगा दी। कुछ साल पहले जहां एक से अधिक फ्लैट दिए जाते थे, वहां कोंड्रा को उनके हक का एक भी फ्लैट नहीं मिल पा रहा है। आज कोंड्रा भी यहीं आस लगाए बैठे है कि मैं भी कह सकूं, कि मुख्यमंत्री साहेब आज मुझे न्याय मिला। चनबसप्पा घोंगडे ने दो शब्द क्या कह दिए, तो मुख्यमंत्री साहब ने अपनी पीठ थपथपा ली। परंतु उन्होंने आगे यह भी कहा कि, नीचले स्तर पर भी न्याय दिलाने की कोशिश की जानी चाहिए इसको नजरअंदाज करके नहीं चलेगा। क्योकि गांव खेड़ो में, छोटे कसबे में हर जगह हर बार मुख्यमंत्री को छोटी मोटी समस्या छुड़ाने जाना संभव नहीं है। इसलिए चनबसप्पा घोंगडे ने कहा नीचले स्तर पर भी न्याय दिलाने की कोशिश की जानी चाहिए इसे गंभीरता से लेकर सिस्टम में सुधार करने का प्रयास होना चाहिए, और लोगों की शिकायतें लोकशाही दिन पर आने की राह न देखते हुए अपने विभागों में ही दर्ज कितनी शिकायतें है, उसका मुआइना किया जाए, तो भी जनता को न्याय मिल सकता है। इससे जनता को लोकशाही दिन के आने की राह भी नहीं देखनी पड़ेगी, और ना हीं लोगों को मंत्रालय में न्याय के लिए चक्कर काटने की जरूरत पड़ेगी। साथ ही किसी को मंत्रालय में आकर ख़ुदकुशी करने की भी नौबत नहीं आएगी।