मुख्यमंत्री फडणवीस ने संघ (आरएसएस) को ही दे दिया धोखा

 08 Jan 2018  943
मुख्यमंत्री फडणवीस ने संघ (आरएसएस) को ही दे दिया धोखा
 
* मीसाबंदी पेन्शन का मामला
 
 
मुंबई, अनिता शुक्ला (07 जनवरी 2018)
 
 
मुंबई- वर्ष 1975 में जब आपातकाल की घोषणा हुई थी, तब तत्कालीन जनसंघ के कई लोगों को जेल की सलाखों के पीछे ड़ाला गया था। जिनके खून पसीने से भारतीय जनता पार्टी नामक बड़ी राजनीतिक दल की नींव रखी गई थी, उनके लिए जब कुछ अच्छा करने का समय आया, तब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने आम निर्णयों की तरह ही मिसाबंदी के निर्णय को भी टालमटोल करके संघ को ही धोखा दे दिया।
 
गौरतलब है कि जब 2014 के चुनाव के बाद देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार राज्य में स्थापित हूई थी, तब मिसाबंदिओं को पेन्शन देने की बात जोर पकड़ने लगी। हालांकि यह मामला संघ (आरएसएस) से संबधित होने के कारण सरकार, खुद फडणवीस या सरकार के कोई  नुमाईंदें इस प्रस्ताव को मना करने की हैसियत नहीं रखते हैं। इसके बावजूद साल 2014 से लेकर साल 2017 तक राज्य सरकार के हुए कई अधिवेशनो में (सत्रो में) यह मुद्दा उठाया गया। लेकिन मुख्यमंत्री फडणवीस ने हर बार इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति दर्शाते हुए पेन्शन देने के मामले में सिर्फ सकारात्मक जवाब दिया। जिसके कारण आपातकाल में कारावास भोगनेवालों में उत्साह की लहरें पैदा हूई, और साथ ही संघ को भी अपने नुमाईंदों द्वारा अच्छा काम किए जाने की संतुष्टी हुई। लेकिन हाल ही में हुए शीतकालीन सत्र में भाजपा के वरिष्ठ नेता एकनाथ खडसे ने फिर से यही मुद्दा उठाया, तब मुख्यमंत्री ने बताया कि ‘‘देशभर में सात से आठ राज्यों में इस तरह की पेन्शन दी जा रही है। हालांकि इन सभी राज्यों का हम अभ्यास कर रहे थे, इसलिए विलंब हुआ। फिलहाल हमारा अभ्यास पूरा  हुआ है। आनेवाले नए वर्ष की पहली  कैबिनेट की बैठक में हम संबंधित प्रस्ताव को मंजूरी दे देंगे।’’ लेकिन साल 2018 में  2 जनवरी की हुई कैबिनेट की बैठक में ऐसा कोई प्रस्ताव किसी भी विभागद्वारा पेश नही किया गया। यह बात अगर संघ या इनके आकाओं को मालूम हो जाती। तब मंत्रिमंडल और मुख्यमंत्री को जवाब देना मुश्किल हो जाता, और कुर्सी हिलने का भी ड़र था। लेकिन जब यह बात ध्यान में आई, तो इस विषय के अभ्यास के लिए उपसमिती का चयन करने की बात मौखिक रूप से मिडिया कर्मियों के बीच जानबूझकर फैलाई गई। जब मुख्यमंत्री ने पहले ही शीतकालीन सत्र के दौरान स्पष्ट कर दिया था कि हमें अभ्यास करने के लिए समय लगा, लेकिन अब अभ्यास पूर्ण हो चुका है, तो फिर समिती स्थापन करने की बात क्यों कही जा रही है, और तो और समिती ही स्थापन करना था, तो साल 2014 से अब तक समिती स्थापन क्यों नही की गई। इतना ही नही तो अभी समिती स्थापित करने की बात कह कर भी लगभग एक सप्ताह हो रहा है , परंतु अभी तक इस समिती का चयन नही हुआ है, और ना ही  इसका कोई जीआर (शासनादेश) निकला। इन सारी घटनाआें को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार और मुख्यमंत्री इसके बारे में गंभीर नही है। इस विषय को यह लोग हलके में ले रहे हैं। इनके लिए यह विषय बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता है।
 
बता दें कि आपातकाल में कष्ट झेलने के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ और  धीरे-धीरे इस संगठन का राजनीतिक महत्व बढ़ता गया और इसकी परिणिति भाजपा जैसे राजनीतिक दल के रूप में हुई, जिसे आमतौर पर संघ की राजनीतिक शाखा के रूप में देखा जाता है। इसके बलबूते देश और राज्य में राज कर रहे मुखिया अगर उसी संघ की जडों को न्याय देते वक्त उन्हें गुमराह करते है, तो ये ना सिर्फ उन सेनापतियों का अपमान हैं। बल्कि सीधे-सीधे संघ को ही धोखा देने जैसा है .