अरब सागर का शिव स्मारक पर्यटकों के लिए बनेगा आकर्षण का केंद्र

 31 Dec 2016  971
वरिष्ठ संवाददाता, मुंबई 
 
महाराष्ट्र की आर्थिक व राजनीतिक राजधानी मुंबई। भौगोलिक दृष्टि से तीन तरफ समुंद्र से घिरी हुई मुंबई। यहां अरब सागर में प्रतिस्थापित होने वाली छत्रपति शिवाजी महाराज की भव्य प्रतिमा। आखिर इतना सब तामझाम किसलिए। यह सब सवाल लोगों के मन में उठने स्वाभाविक हैं। अरब सागर में शनिवार को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बहुचर्चित शिव स्मारक का जलपूजन किया है। कालांतर में मुंबई में बना यह भव्य स्मारक देशी व विदेशी पर्यटकों के लिए एक अलग ही आकर्षण का केंद्र बनने जा रहा है। विदेशी पर्यटकों के साथ यहां भारतवासियों को भी शिवाजी महाराज के बारे में जानकारी मिल सकेगी, जो अगली पीढ़ी के लिए बहुत ही प्रेरक व ज्ञानवद्र्धक साबित होने वाली है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस शिव स्मारक का जलपूजन करने के बाद बीकेसी ग्राउंड में उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए इस प्रश्र का उत्तर देने का प्रयास किया था। उन्होंने कहा कि देश में पर्यटन उद्योग से खरबों रुपए कमाया जा सकता है। देश में कई ऐसे ऐतिहासिक स्थल हैं, जिनका अगर सही तरीके संवद्र्धन व संरक्षण किया गया और उन्हें सजाया सवारा गया तो यहाँ पर्यटन से होने वाली आमदनी को बढ़ाया जा सकता है। अरब सागर में बनने वाला विश्व का सबसे ऊंचा भव्य स्मारक बनने के बाद प्रधानमंत्री की आशाओं अपेक्षाओं पर खरा उतरने वाला है, इसमें किसी को शंका नहीं है। इसी कार्यक्रम में राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा कि हर किसी को वर्तमान में रहते हुए अपने भुतकाल की चिंता अवश्य करनी चाहिए। जो व्यक्ति वर्तमान में रहते हुए अपने भुतकाल की चिंता नहीं करता, उसका वर्तमान तो रहता है ,लेकिन भविष्य नहीं रहता है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने यहां जोर दिया कि छत्रपति शिवाजी महाराज की राजप्रणाली की जानकारी भविष्य में लोगों तक पहुंचाने के लिए इस स्मारक का होना जरुरी था। इसलिए राज्य सरकार 3600 करोड़ रुपए खर्च कर इस ऐतिहासिक भव्य स्मारक का शिलान्यास कर रही है। यह भव्य स्मारक विश्व के सबसे उंचे स्मारक लिबर्टी ऑफ स्टैचू से भी उंचा बनाया जाने वाला है। इतना ही यहां पर शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित हर छोटी बड़ी घटनाओं की जानकारी प्राप्त की जा सकेंगी। शिवाजी स्मारक का भूमिपूजन राज्य सरकार की ओर से धूमधाम से किया गया । दरअसल शिवाजी महाराज के जीवन वृत्त पर संक्षेप में कुछ बताना जरूरी लगने लगा है। छत्रपति शिवाजी महाराज या शिवाजी राजे भोसले (1630-1680) भारत के महान योद्धा एवं रणनीतिकार थे जिन्होंने 1674 में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। उन्होंने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। सन 1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ और छत्रपति बने। शिवाजी ने अपनी अनुशासित सेना एवं सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया। उन्होंने समर-विद्या में अनेक नवाचार किये तथा छापामार युद्ध की नयी शैली (शिवसूत्र) विकसित की। उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनैतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया और फारसी के स्थान पर मराठी एवं संस्कृत को राजकाज की भाषा बनायी थी। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में बहुत से लोगों ने शिवाजी के जीवनचरित से प्रेरणा लेकर भारत की स्वतन्त्रता के लिये अपना तन, मन धन न्यौछावर कर दिया। शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था । उनका बचपन उनकी माता जिजाऊ के मार्गदर्शन में बीता। वह सभी कलाओं में माहिर थे, उन्होंने बचपन में राजनीति एवं युद्ध की शिक्षा ली थी। ये भोंसले उपजाति के थे जो कि मूलत: कुर्मी जाति के थे । इसके बाद वह अपनी कुशल युद्धनीति की बदौलत दुश्मनों को पछाड़ते रहे तथा सन् 1674 तक शिवाजी ने सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था । पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु ब्राहमणों ने उनका घोर विरोध किया। शिवाजी के निजी सचिव बालाजी आव जी ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और उन्होंने ने काशी में गंगाभट नामक ब्राह्मण के पास तीन दूतों को भेजा, किन्तु गंगा ने प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योंकि शिवाजी क्षत्रिय नहीं थे उसने कहा की क्षत्रियता का प्रमाण लाओ तभी वह राज्याभिषेक करेगा। बालाजी आव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड के सिसोदिया वंश से समबंद्ध के प्रमाण भेजे जिससे संतुष्ट होकर वह रायगढ़ आया और उसने राज्याभिषेक किया। राज्याभिषेक के बाद भी पूना के ब्राह्मणों ने शिवाजी को राजा मानने से मना कर दिया | विवश होकर शिवाजी को अष्टप्रधान मंडल की स्थापना करनी पड़ी । विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया। शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि ग्रहण की। काशी के पण्डित विशेश्वर जी भट्ट को इसमें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। पर उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया। इस कारण से 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार उनका राज्याभिषेक हुआ। दो बार हुए इस समारोह में लगभग 50 लाख रुपये खर्च हुए। इस समारोह में हिन्दू स्वराज की स्थापना का उद्घोष किया गया था। विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिन्दू साम्राज्य था। शिवाजी को एक कुशल और प्रबुद्ध सम्राट के रूप में जाना जाता है। यद्यपि उनको अपने बचपन में पारम्परिक शिक्षा कुछ खास नहीं मिली थी, पर वे भारतीय इतिहास और राजनीति से सुपरिचित थे। उन्होंने शुक्राचार्य तथा कौटिल्य को आदर्श मानकर कूटनीति का सहारा लेना कई बार उचित समझा था। अपने समकालीन मुगलों की तरह वह भी निरंकुश शासक थे, अर्थात शासन की समूची बागडोर राजा के हाथ में ही थी। पर उनके प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद थी जिन्हें अष्टप्रधान कहा जाता था। इसमें मंत्रियों के प्रधान को पेशवा कहते थे जो राजा के बाद सबसे प्रमुख हस्ती था। अमात्य वित्त और राजस्व के कार्यों को देखता था तो मंत्री राजा की व्यक्तिगत दैनन्दिनी का खयाल रखता था। सचिव दफ़तरी काम करते थे जिसमें शाही मुहर लगाना और सन्धि पत्रों का आलेख तैयार करना आदि शामिल होते थे। सुमन्त विदेश मंत्री था। सेना के प्रधान को सेनापति कहते थे। दान और धार्मिक मामलों के प्रमुख को पण्डितराव कहते थे। न्यायाधीश न्यायिक मामलों का प्रधान था। इस तरह शिवाजी महाराज अपनी प्रजा की सेवा को सर्वोच्च मानते थे। उनका जीवन चरित्र, उनकी युद्धनीति, उनकी राजप्रणाली आगामी पीढ़ी तक पहुंचाया जाना बेहद जरुरी है। इसीलिए 1980 के दशक से ही छत्रपति शिवाजी महाराज का भव्य स्मारक बनाए जाने की मांग उठने लगी थी। वर्तमान राजनीति में वोट का कुछ ज्यादा ही महत्व हो गया है। शिवाजी महाराज के स्मारक को भी इसी राजनीति से जोड़ा गया और पिछली सरकार ने छत्रपति शिवाजी महाराज की भव्य प्रतिमा बनाए जाने का आश्वासन कई बार अपने चुनावी घोषणापत्र में भी दिया था,लेकिन सत्ता में आने के बाद पिछली सरकार ने इससे किनारा कर लिया था। इसी हथियार का प्रयाोग कांग्रेस व राकांपा ने दूसरी बार भी चुनाव आने पर किया, लेकिन इस बार भी सत्ता में पहुंचने पर शिवाजी महाराज को भूला दिया। अरब सागर में भव्य प्रतिमा के नाम पर बजट में 500 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया गया ,लेकिन आखिर में यह सब दिखावा ही साबित हुआ और सरकार की ओर से मात्र अरब सागर में जगह का चयन किया जा सका। बाद में सरकार की ओर कहा गया कि पर्यावरण विभाग की मंजूरी मिलने में देर हो रही है। उस समय महाराष्ट्र व दिल्ली में कांग्रेस पार्टी की ही सरकार थी। लेकिन महज वोट बैंक की राजनीति की वजह से छत्रपति शिवाजी महाराज के भव्य स्मारक का काम नहीं हो सका था। राज्य में सत्ता परिवर्तन ने बाद महाराष्ट्र व केंद्र अर्थात दिल्ली में भाजपा की सरकार अस्तित्व में आई और तब से ही राज्य सरकार ने छत्रपति शिवाजी महाराज के स्मारक के काम को प्राथमिकता देते हुए शुरू किया। इस स्मारक के लिए लगने वाली पर्यावरण विभाग की मंजूरी भी राज्य सरकार ने केंद्रीय पर्यावरण विभाग से हासिल किया। हालांकि छत्रपति शिवाजी महाराज की भव्य प्रतिमा प्रतिस्थापित करने में आने वाली हर अड़चन को प्रधानमंत्री ने दूर करने का महत्वपूर्ण काम किया है। राजनीति की हद तो तब हो गई, जिस दिन प्रधानमंत्री इस बहुप्रतीक्षित भव्य स्मारक का जलपूजन कर रहे थे, उसी दिन राज्य के पूर्वमुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने इसका उद्घाटन करने में डेढ़ साल की देरी का आरोप लगाया और कहा कि मुंबई में होने वाले महानगरपालिका चुनाव को देखते हुए देरी से छत्रपति शिवाजी महाराज के भव्य स्मारक का उद्घाटन किया जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री की इस घोषणा को लोग नजरअंदाज ही करना ज्यादा उपयुक्त समझ रहे हैं। अरब सागर में छत्रपति शिवाजी महाराज के स्मारक का काम दो चरणों में पूरा होने वाला है और पहले चरण का काम 2019 तक पूरा हो जाने के लिए प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री दृढ़संकल्प हैं, इसलिए देश की अगली पीढ़ी के लिए यह स्मारक बहुत ही उपयोगी साबित होने वाला है।