कचरे से संवारी 150 जिंदगी
28 Oct 2015
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मुंबई: आम जिंदगी में हम कचरे से दूर भागते है, लेकिन एक महिला ने कचरे के जरिए 150 जिंदगियों की दिशा और दशा बदल दी है। शुरूआत मुश्किल थी, लेकिन गीतांजली एनजीओ सेंटर चलाने वाली महिला रागिनी जैन ने कचरे के जरिए बेहद गरीब तबके के लोगों की जिंदगी संवारने का महत्वपूर्ण एवं सराहनीय काम किया है। साल 2002 में मुंबई के कचरे से जिंदगियां बदलने का जो काम रागिनी जैन ने शुरू किया, वो अब 12 साल बाद 150 के लगभग भिखारियों को सम्मानजनक आजिविका देता है, और मुंबई के कचरे का छोटा सा ही हिस्सा सही लेकिन उसका सही सदुपयोगी निवारण हो रहा है।
रागिनी जैन 2002 में किसी काम से मुंबई आई थीं। मुंबई में आने के बाद उन्होंने जगह-जगह फैले कचरे को देखा, तो उनके मन में ख्याल आया कि मुंबई साफ होनी चाहिए और कचरे से लोगों का भला भी होना चाहिए। इसी सोच के साथ रागिनी जैन ने बीएमसी कमिश्नर अजीत जैन से मुलाकात करके उनसे पीपीपी(लीज) के तहत भूखंड की मांग किया। बीएमसी कमिश्नर ने उन्हें 500 स्क्वेयर फीट जमीन लीज पर दिया, जहां उन्होंने अपने खर्चे से साल 2003 में डीसेन्ट्रलाईज्ड गार्बेज सेंटर शुरू किया, और विर्लेपाले, जुहू, जेवीपीडी इलाके में घूमना शुरू किया। उन्होंने कचरा चुनने वाले व भिखारियों पुरुषों और महिलाओं को अपने साथ कचरे के उचित इस्तेमाल एवं सफाई के काम में जोड़ना शुरू किया। हालांकि शुरूआत में जैन के साथ इस मुहिम में 25 से 30 लोग ही जुड़े थे, लेकिन अब 12 साल बाद इस डीसेन्ट्रलाईज्ड गार्बेज सेंटर में 150 के लगभग भिखारी काम करते है, और हर महीने 15 से 20 हजार रुपये कमाकर अच्छी जिंदगी व्यतीत कर रहे है। इन भिखारियों के बच्चे अंग्रेजी स्कूल में अच्छी शिक्षा ग्रहण कर रहे है।
‘देखने लायक होता है जुहू इलाका’
मुंबई के विलेपार्ले इलाके में चलाए जा रहे इस डीसेन्ट्रलाईज्ड गार्बेज सेंटर के कारण जुहू इलाके की सफाई देखने लायक होती है, क्योंकि डीसेन्ट्रलाईज्ड गार्बेज सेंटर में काम करने वाले कर्मचारी हर रोज सुबह साढ़े छह बजे घर-घर जाकर कचरा इक्कठा करते है। साथ ही रास्तों समेत नाले में पड़ा कचरा चुनते है। रोजाना 3 से 4 हजार मेट्रिक टन कचरा उठाने का काम यह कर्मचारी करते है। इन कचरों में से कागज, प्लास्टिक, मैटल और खाद्य पदार्थों को अलग-अलग करके उसपर प्रक्रिया किया जाता है। प्लास्टिक और थर्मोकोल जैसी चीजों को मिक्सर मे ग्राइंड किया जाता है और उसके दाने सीधे मीलो को बेचा जाता है। कागज समेत अन्य चीजें सीधे मिल मालिक यहां से रोजाना खरीदते है। यानि कि बेचने खरीदने में कोई बिचौलिया नहीं होता है। साथ ही गीले-सूखे कचरे से यहां खाद बनाया जाता है, जिससे पेड़ लगाने के दौरान इस्तेमाल में लाया जाता है।
‘सड़कों पर मांगते थे भीख, कचरे ने बदल दी जिंदगी’
डीसेन्ट्रलाईज्ड गार्बेज सेंटर में काम करने वाली पार्वती बताती है कि दस साल पहले सड़कों पर भीख मांगकर और कचरे चुनकर अपना गुजारा करना पड़ता था, लेकिन अब दस बाद जिंदगी में बड़ा बदलाव आ गया है। महीने के 15 से 20 हजार रुपये कमाकर अपने बच्चों को अच्छी जिंदगी देने का मेरा सपना साकार हुआ है। शंकर का कहना है कि कचरे ने मेरी जिंदगी बदल दी। मेरे दो बच्चे है, जो अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते है और कम्प्यूटर की शिक्षा ग्रहण करते है। कमला का कहना है कि जब से यह सेंटर शुरू हुआ है, तब से मैं इसमें काम कर रही हूं। 12 साल पहले की तुलना में अब जिंदगी बेहतर लगने लगी है। बच्चों को अच्छा जीवन दे रही हूं। इसकी मुझे खुशी है। लक्ष्मी कहती है कि अब मैं गरीब नहीं रहीं, तो वहीं 70 वर्षीय वाक्यम कहती है कि अब हम हर चीज खरीदने में सक्षम है।