लोकसभा चुनाव 2019- ये राह नहीं आसान
08 Apr 2019
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राकेशमणि तिवारी
मुंबई,(07 अप्रैल 2019)- चुनावी महापर्व के कुरूप हो चुके स्वरूप के साथ लोकसभा चुनाव दो हजार उन्नीस की घोषणा हो चुकी है । शहजादे , युवराज , मौत का सौदागर , चाय वाला और नीच जैसे शाब्दिक शस्त्रों के दो हजार चौदह में ही संधान कर लेने के उपरांत , लोकतांत्रिक मूल्यों के चीरहरण में लगे राजनैतिक दलों द्वारा कुत्सित एवं घृणित मानसिकता के साथ नये शब्दास्त्रों को घात - प्रतिघात हेतु संजोया जा रहा है । ऐसे में फेंकू , गप्पू , पप्पू , राष्ट्रवादी , राष्ट्रद्रोही , नामदार , कामदार लात मार कर हटा दिया जैसे अशोभनीय नव निर्मित शब्द तुणीरों से सत्ता की व्योमोहग्रस्तता को साधने का उपक्रम शुरू हो चुका है ।
एक तरफ अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती और सत्ता के दूर होने के संताप से ग्रस्त कांग्रेस किंकर्तव्य विमूढ़ हो असमंजसग्रस्तता की स्थिति में है तो दूसरी ओर पुनः सत्तासीन होने की लालसा में राष्ट्रवाद के रथ पर सवार भाजपा पूरे दमखम के साथ मैदान में हैं । दोनों राष्ट्रीय दलों के बीच प्रलोभी सत्ताई समर में जहाँ जनतंत्र की खूबसूरती के लिए आवश्यक विकास का मुद्दा गायब हो चुका है वहीं क्षेत्रीय दलों द्वारा अपने अस्तित्व को जिन्दा रखने हेतु बेमेल गठबंधन को भी विवश होना पड़ा है । कांग्रेस सहित सारे क्षेत्रीय दल अपने सिपहसलारों के मनोबल को जीवित व मजबूत किये रखने हेतु भले यह कह रहे हैं कि मोदी लहर समाप्त हो चुकी है पर अंदर ही अंदर भय किसी का भी कम नहीं हुआ है । परिणामतः कहीं बेमेल गठबंधन तो कहीं प्रत्याशियों का टोटा साफ दिखाई दिया है ।
ऐसी ही , एक सीट महाराष्ट्र की उत्तर मुम्बई लोकसभा सीट है जहाँ से दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बड़बोले कद्दावर नेता पूर्व मुम्बई अध्यक्ष संजय निरूपम को 4 लाख 46 हजार 528 मतों से पटखनी मिली थी , उन्हें सपनों में भी पराजय का भूत दिखाई पड़ता था । लाख दबाव के बाद भी मुम्बई कांग्रेस का अध्यक्ष पद गँवा दिया पर उत्तर मुम्बई से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाये । जुटाते भी कैसे यह तो उन्हें भी ज्ञात था कि दो हजार नौ में बमुश्किल 4 हजार 7 सौ 79 मतों से ही राम नाईक के सामने उन्हें विजय मिली थी जबकि 2 हजार चौदह की मोदी लहर में महज 2 लाख 17 हजार 422 मतों से ही संतोष करना पड़ा था । इतनी बड़ी पराजय जो लोकसभा चुनाव 2014 के बाद पूरे देश में चर्चा का विषय थी , यह वे कैसे भूल सकते हैं । इसलिए उत्तर पश्चिम मुम्बई सीट पर चुनाव लड़ने की कीमत पर अध्यक्ष पद छोड़ना उन्हें मुफ़ीद लगा । हालाँकि 1952 से लेकर आज तक उत्तर मुम्बई लोकसभा सीट पर किसी एक विशेष दल का वर्चस्व नहीं रहा है पर भारतीय जनता पार्टी के उभार के बाद गुजराती मतों की अधिकता की वजह से यह सीट 1989 से लेकर 2004 तक भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता राम नाईक के कब्जे में रही । 1952 में सीपीआई नेता श्रीपाद डांगे ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया , तो 1957 और 1962 में कांग्रेस के वी कृष्ण मेनन यहाँ से लोकसभा पहुँचे । दुबारा हुए नये परिसीमन के बाद 1977 में भारतीय लोकदल से मृणाल गोरे ( पानी वाली बाई के नाम से मशहूर ) और 1980 में जनता पार्टी से रविन्द्र वर्मा को लोकतंत्र के मंदिर तक पहुंचने का अवसर मिला । 1984 में हुए लोकसभा चुनाव में एकबार पुनः यह सीट कांग्रेस की झोली में पड़ी और अनूपचंद शाह सांसद चुने गये । 1989 से 2004 तक यहाँ से वनवास झेल चुकी कांग्रेस ने अभिनेता गोविंदा को मैदान में उतारा और राम नाईक जैसे नेता को लगभग 1 लाख 47 हजार मतों से पराजय का मुँह देखना पड़ा । दो हजार चार से पाँच वर्षों के वनवास के बाद दो हजार नौ में भी मिली अप्रत्याशित पराजय ने तो राम नाईक के कैरियर पर ही विराम लगा दिया और अब वे उसी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल हैं जिनके साथ मनसे के गुण्डों के द्वारा किये गये उत्पात ने उनके पराजय की पटकथा लिखी थी । यदि वे मनसे के 2008 के उत्पात के दौरान एक बार भी मुखर हुए होते तो 2014 में उन्हें पराजय का मुँह न देखना पड़ता । मनसे के चुनाव चिन्ह पर लड़े शिरीष पारकर ने 1लाख 47हजार 502 वोट प्राप्त किया था , जो कहीं न कहीं भाजपा का ही मत था , खैर जमीन पर लाठी पीटने से साँप नहीं मरता और अब इस सीट के प्रतिनिधित्व का सपना तो उनके लिए बेमानी ही है । 2014 लोकसभा चुनाव में भले ही गोपाल शेट्टी मोदी लहर के नाम पर चुन कर आये हों पर इसके बाद अपने विरोधियों पर कहर बन कर टूटने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है । वर्तमान में छः में से चार विधायक और 24 नगर सेवक भाजपा के तथा एक विधायक और और 12 नगर सेवक सेना के हैं , ऐसे में संजय निरूपम क्या किसी के लिए भी गोपाल शेट्टी का सामना करना आसान नहीं है । विगत पांच वर्षों में 17 करोड़ का फंड खर्च कर शेट्टी ने गार्डन , जोगिंगट्रैग , जिमखाना और पानी की समस्या पर काम भी खूब किया है । सदन में भी बेहतरीन उपस्थिति के साथ जन समस्याओं को लेकर सवाल भी खूब उठाया है । ऐसे में कांग्रेस की डगर यहाँ से आसान नहीं है , इसका भान कांग्रेस को भी बखूबी है । ऐसे में यह सीट सपा की झोली में समझौते के तहत डालने की कोशिश हुई थी पर हार के भय से सपा ने समझौता नहीं किया और गठबंधन भी नहीं हो पाया अंततः कांग्रेस ने एक बार फिर फिल्मी चेहरे के तौर पर उर्मिला मार्तोंडेकर को मैदान में उतार कर लड़ाई को दिलचस्प जरूर बना दिया है पर गोविंदा के चुन कर आने के बाद जनता का जो अनुभव रहा है उससे जनतंत्र के मन मस्तिष्क से स्टारड्रम का भूत उतर चुका है । यही कारण है जो उर्मिला की राह मुश्किल करता है , फिर भी कांग्रेस की आस उर्मिला से जगी है । असमंजस में भाजपा भी है कारण लगभग डेढ़ लाख मतदाताओं का यहाँ से विस्थापित होना बताया जा रहा है । फिर भी रणभेरी बज चुकी है दोनों पक्ष आमने - सामने हैं , अब देखना है ताज किसके शीश सहजता है ।