मुंबई
बी-टाउन के नामचीन निर्माता भूषण कुमार, किशन कुमार और विक्रम भट्ट व निर्देशक शिवम नायर की फिल्म 'भाग जॉनी भाग ऑडियंस के सामने आने वाली है। फिल्म पूरी कंप्लीट हो चुकी है और आजकल फिल्म से जुड़े सभी लोग उसके प्रोमोशन में बिजी हैं। इसी सिलसिले में ''राजस्थान पत्रिका ने फिल्म के लीड स्टार कुणाल खेमू और जोआ मोरानी से बात की। इस दौरान दोनों ने अपनी रील और रियल लाइफ से जुड़े कई पहलुओं पर काफी कुछ शेयर किया, जिसके पेश हैं अंश-
इसी सिलसिले में निर्देशक ने फिल्म के अलावा कई अन्य पहलुओं पर भी बेबाकी से चर्चा की। पेश हैं उनके कुछ अंश-
'भाग जॉनी के निर्देशक ने की ''राजस्थान पत्रिका की तारीफ
निर्देशक शिवम नायर से 'राजस्थान पत्रिका ने जब सवाल किया कि फिल्म के दौरान की कोई ऐसी यादगार घटना, जिसे आप कभी भुला नहीं सकेंगे? तो वे बोल बैठे कि वाकई में अभी तक इस तरह का अलग सवाल किसी ने नहीं किया...(अलग अंदाज में... इट्स अमेजिंग) वाकई में यह सवाल काबिल-ए-तारीफ है। इसके अलावा मैं आपको बता दूं कि दर्शक हमारी इस फिल्म को उनकी अन्य फिल्मों की तरह हाथों हाथ लेंगे।
फिल्म के दौरान की कोई ऐसी यादगार घटना, जिसे आप कभी भुला नहीं सकेंगे?
एक घटना ऐसी है कि मैं उसे नहीं भुला पा रहा हूं। (कुछ सोचते हुए...) आगे बताते हैं, 'एक दिन मैं अपने कैमरामैन, दोनों एक्शन मास्टर और असिस्टेंट के साथ एक वैन में शूट के लिए सुबह करीब 6-00 बजे बैंकॉक से अपने शूटिंग स्पॉट पटाया जा रहा था। इसी दौरान रास्ते में हमारी आंखों के सामने आगे रोड पर जा रहे एक वैन का एक्सीडेंट हो गया, फिर जब हम अपनी वैन रुकवाकर उनकी मदद के लिए पास पहुंचे तो पता चला कि वैन के सारे डोर लॉक हो चुके थे और अंदर के लोग चीख-चिल्ला रहे थे। फिर आनन-फानन में हमारे कैमरामैन ने एक पत्थर से गाड़ी का शीशा तोड़कर तीन लोगों को बचाया, जिनमें एक ड्राइवर और दो महिलाएं थीं। वाहन में आग लगने की वजह से हमारी लाख कोशिशों के बावजूद हम सबसे पीछे की ओर बैठे एक लेडी और दो बच्चों को नहीं बचा सके। (अलग आवाज में...) हमें तो देखकर हैरत हुई कि वहां पर कई लोग रुककर फोटोशूट तो कर रहे थे, लेकिन किसी ने भी एक्सीडेंट में हुए घायलों की मदद नहीं की। खैर, इसी को लेकर रास्ते भर टेंशन रही और फिर जब सेट पर पहुंचे तो उस हादसे की वजह से किसी का भी मूड सही नहीं था। इसलिए हमें उस दिन का शूट भी कैंसल करना पड़ा। इसके अलावा एक घटना शूट के दौरान अभिनेता कुणाल खेमू के साथ भी घटी थी... इस तरह से फिल्म के दौरान दो घटनाएं कुछ एैसी घटी हैं, जिन्हें याद करता हूं तो सोच में पड़ जाता हूं।
फिल्म के लीड स्टार कुणाल खेमू और जोआ मोरानी ने अपनी रील और रियल लाइफ से जुड़े कई पहलुओं पर काफी कुछ शेयर किया, जिसके पेश हैं अंश-
इंडस्ट्री में फिल्म 'हम हैं राही प्यार के से अब तक की जर्नी आपकी कैसी रही?
(कुछ सोचते हुए...) बहुत अच्छी होने के साथ ही इंडस्ट्री में मेरी काफी अलग जर्नी रही। एक तरह से देखा जाए तो मेरी दो अलग-अलग तरह की जर्नी रहीं। बचपन में पहले मैं सिर्फ अपने काम से ही मतलब रखता था, यानी सेट पर जाकर अपना अभिनय व डबिंग करना। साथ ही आज के जैसा उस दौरान कोई माहौल भी नहीं था। मुझे जो भी रोल करने को मिलते थे, मैं करता था। उस समय तो मुझे किरदार पर ही फिल्में मिलती थीं, लीड रोल करने का मौका भी नहीं मिला था। इतना ही नहीं, मैं खुद भी अपनी मूवी पहली बार पर्दे पर ही देख पाता था। इसके अलावा मैं खुद को लकी भी मानता हूं कि मुझे अच्छे किरदारों में काम करने का मौका मिला, जो आज भी लोगों को याद हैं। (थोड़े जोशीले मुद्रा में...) बताना चाहूंगा कि ऑडियंस आज भी मुझे 'राजा हिंदुस्तानी, 'हम हैं राही प्यार के, 'भाई या 'जख्म जैसी हिट फिल्मों के किरदार से जानती है। इसके अलावा एक्टर बनने का प्रोत्साहन मुझे फिल्म 'जख्म से मिला। फिर कॉलेज खत्म होने के बाद मैंने अभिनय को सीरियस ले लिया। इस तरह से 'जख्म तक का दौर मेरे लिए एक हॉबी जैसा ही रहा, लेकिन फिल्म 'कलयुग से अभिनय मेरी जिंदगी का प्रोफेशन बन गया। बस, यहीं से काफी चेंज देखने को मिलने लगे। तरह-तरह की तकनीकि और नई-नई कहानियां इंडस्ट्री में आने लगीं। इस तरह से इंडस्ट्री में मुझे दो अलग-अलग जर्नी जीने का मौका मिला, जो काफी बेहतरीन रहा। इसके अलावा इंडस्ट्री में हमारी जर्नी आज भी जारी है।
यह फिल्म आपको कैसे मिली?
सन् 2012 में जब मैं फिल्म 'ब्लड मनी की शूटिंग कर रहा था तो मेरी मुलाकात निर्देशक विक्रम भट्ट से हुई। उन्होंने मुझसे कहा था कि वे मेरे लिए एक फिल्म लिख रहे हैं, जो मुझे काफी पसंद भी आएगी। फिर वह फिल्म खत्म हो गई। आगे (कुछ सोचते हुए...) 'गो गोवा गॉन से पहले निर्देशक शिवम नायर किसी और फिल्म की कहानी लेकर मेरे पास आए थे, लेकिन मैंने उसी मुलाकात में उन्हें इस फिल्म की कहानी सुना दी तो उन्हें भी बहुत अच्छी लगी। फिर जब इस फिल्म के लिए डायरेक्टर की खोज होना शुरू हुई, तो जब यह कहानी शिवम के पास पहुंची। देखते हुए उन्होंने कहा कि यह कहानी तो मैं सुन चुका हूं और काफी इंटरेस्टिंग भी है। मैं इसे जरूर बनाऊंगा। बस, इसी तरह से मुझे इसमें काम करने का मौका मिल गया।
फिल्म की कहानी और रोल के बारे में कुछ बताइए?
मुझे लगता है कि इस तरह की कहानी इंडिया में पहली बार आ रही है, जिसे ऑडियंस भी काफी पसंद करेगी। हालांकि ऐसा कॉन्सेप्ट लोगों ने सुना होगा और ऐसी कहानियां भी कई लोगों ने सुनी होंगी। जैसे फिल्मों में एक्टर कोई गलत काम करता है तो उसे आगे चलकर गलत ही दिखाया जाता है, लेकिन इसमें दो किरदारों को दिखाया गया है। एक ओर जहां मैं गलत करता हूं तो मेरे साथ क्या होता है और फिर दूसरी तरफ मैं कुछ सही करने की कोशिश करता हूं तो मुझे जिंदगी में आगे बढऩे के लिए क्या-क्या करना पड़ता है। इस तरह से फिल्म में दो कहानियों को एक साथ लेकर चला गया है। यानी हमारे चाहने वालों को अब एक ही फिल्म में दो कहानियों को देखने का मौका मिलेगा, जिसे लोग जमकर एंज्वॉय भी करेंगे। इसके अलावा मैंने इसमें जनार्दन अरोड़ा का रोल किया है, जो विदेश में रहता है और उसने अपना नाम शॉटकट में जॉनी रख लिया है। वह एक चार्टर्ड एकाउंटेंट होने के साथ ही स्मार्ट और इंटेलिजेंट भी है। वह थोड़ा-बहुत शो ऑफ भी करता है, यानी जितना पैसा उसकी जेब में नहीं होता, हकीकत में उससे कई गुना ज्यादा पैसा उसके पास होता है। फिर एक बार जॉनी अपने ही किए-कराए पर बुरी तरह से फंस जाता है। इसके अलावा उससे निकलने के लिए भी जॉनी को जो रास्ता मिलता है, वह भी गलत ही होता है। इस तरह से दो कहानियों के साथ फिल्म में जॉनी की जिंदगी आगे बढ़ती है।
फिल्म की यूएसपी क्या है, जो ऑडियंस को अपनी ओर खींच सके?
मेरे अनुसार तो इस फिल्म की कहानी ही सबसे बड़ा प्लस प्वॉइंट है। यह फिल्म थ्रिलर है, लेकिन पूरी तरह से एंटरटेनर है। क्योंकि फिल्म को इस तरह से निर्देशित किया गया है कि ऑडियंस आखिर तक देखती रहेगी और उसे यह कॉन्सेप्ट भी काफी पसंद आएगा। इसके अलावा हमने इस फिल्म के एक एंगल को अभी तक दिखाया भी नहीं है, जो हम चाहते हैं कि ऑडियंस फिल्म रिलीज होने पर आकर ही देखे। साथ ही यह पूरी इंडियन कहानी है और हर कोई इसे आसानी से समझ भी सकेगा।
पटौदी खानदार को लेकर करियर में आपको कितना सपोर्ट मिलता है?
(थोड़ा जुदा अंदाज में...) नहीं, ऐसा तो कुछ भी नहीं। हम अपने करियर को लेकर बहुत ही इंडिपेंडेंट रहते हैं। पटौदी खानदान के सभी लोग अपने-अपने कामों को लेकर बिजी रहते हैं। इसके अलावा हमने एक-दूसरे को कभी काम से संबंधित कोई एडवाइज भी शेयर करने की कोई कोशिश नहीं की। इस तरह से प्रोफेशन और बिजनेस को लेकर हम सभी अलग ही रहते हैं।
क्या आप कभी सोहा के साथ फिल्म में नजर आएंगे?
अभी तो नहीं, लेकिन आगे चलकर अगर कोई फिल्म ऐसी मिली, जिसकी कहानी उन्हें पसंद आई और मुझे भी। यानी उन्हें बतौर अभिनेत्री फिल्म पंसद आनी चाहिए और मुझे भी पर्सनली अभिनेता के तौर पर फिल्म की स्क्रिप्ट समझ में आनी चाहिए... हम तभी फिल्म साथ करेंगे। (थोड़ा अलग मूड में...) न कि इसलिए कि हम एक कपल हैं।
जम्मू एंड कश्मीर में चल रही कश्मीरी पंडितों के बारे में आपकी क्या राय है?
(कुछ सोचते हुए और अलग अंदाज में...) हम सन् 1989 में वहां से आ गए थे। उस समय मैं काफी छोटा था, जब हम वहां से निकल गए। इसलिए कोई राय तो मैंने बनाई नहीं। लेकिन मेरा मानना है कि आज भी कश्मीरी पंडितों को अपने ही देश में बेगाना जैसा समझा जा रहा है। हम तो बस यही चाहेंगे कि सरकार को इस बाबत कोई उचित निर्णय लेना चाहिए, ताकि जम्मू एंड कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की हालत सुधर सके। इसके अलावा जब से मैं वहां से आया हूं, तब से आज तक दोबारा मैं वहां पहुंच नहीं सका। हालांकि हमारे घर वाले यदा-कदा वहां जाया-आया करते हैं।
सैफ अली खान की फिल्म 'फैंटम के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
वाकई में उन्होंने उस फिल्म में काफी मेहनत और लगन से काम किया है। साथ ही वे इस फिल्म से लोगों के जहन में बन चुकी उनकी इमेज में भी काफी सुधार हुआ है। इसके अलावा मैंने उनकी फिल्म तो अभी तक नहीं देखी, क्योंकि मैं अभी दो-तीन दिन पहले ही वापस इंडिया लौटा हूं, लेकिन उनके काम से मैं काफी खुश हूं।
सवाल जोआ मोरानी से
पहले तो आप अपने बारे में विस्तार से बताइए?
(ठीक है तो...) मुंबई में ही जन्मी हूं तो स्कूल के समय छुट्टियों पर मम्मी और पापा हमें विदेश ले जाया करते थे। उस दौरान 'दिल तो पागल है, 'कुछ कुछ होता है ये सारी फिल्में मेरी फेवरिट होती थीं और बचपन से ही मुझे एक्टर बनने का शौक भी रहा है। क्योंकि उन फिल्मों की तरह हमें सारी कहानी और किरदार पता होता था... बस यही सारी जानकारी होने की वजह ने मुझमें एक्टर बनने का हौसला दिया है। पहले से बॉलीवुड म्यूजिक और उसकी कहानी बहुत पसंद किया करती थी। अपने स्कूल समय में भी मैं ड्रामा वगैरह किया करती थी। फिर जब स्कूल-कॉलेज खत्म हो गया तो मैंने अनुपम खेर के एक्टिंग स्कूल को ज्वॉइन कर लिया। फिर अभिनय की ट्रेनिंग कंप्लीट करने के बाद मैं निर्देशक फरहा खान के साथ एक असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर जुड़ गई, बता दें कि तब वे फिल्म 'ओम शांति ओम का निर्देशन कर रही थीं। (फिर... कुछ अलग अंदाज में) वैसे भी मुझे एक्टर बनना था, इसके लिए मुझे फरहा खान का काफी साथ मिला। आगे चलकर मुझे फिल्म 'आलवेज कभी कभी से डेब्यू करने का सुनहरा मौका मिला। इसके बाद भी कई फिल्में कीं, लेकिन वे पूरी ही नहीं हो सकीं और इस तरह से यह मेरी दूसरी फिल्म है। ( राहत भरी सांस लेती हैं)
अपनी दूसरी फिल्म में ही कुणाल खेमू के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा आपका?
(आई थिंक...) कुणाल खेमू काफी सीनियर हैं मुझसे। उन्होंने बचपन से ही काफी सारी फिल्में की हैं। साथ ही कई बड़े स्टार्स के साथ वे फिल्मों में नजर भी आ चुके हैं। इस लिहाज से वे इतने एक्सपीरिएंस पर्सन हैं कि मैं तो बस, बैठकर उन्हीं के शॉट्स देखती थी। (फिर मुस्कान के साथ...) सेट पर डायरेक्टर अपनी टीम के साथ कैसे बिहेव करते हैं, एक एक्टर को शॉट से पहले निर्देशक से क्या कुछ पूछना चाहिए आदि जैसे बातों को सीखने का मौका मिला है कुणाल से...।
फिल्म में अपने रोल के बारे में बता दीजिए?
इसमें मैंने तान्या नाम की लड़की का किरदार निभाया है, जो थाइलैंड की रहने वाली है और बिल्कुल सिंपल सी इंडिपेंडेंट रहती है। (कहानी कुछ यूं है...) फिर अचानक एक दिन उसके सामने एक अंजान सा आदमी आ जाता है, जिसे वह जानती भी नहीं है और मजबूरन तान्या को उस पर (जॉनी) ट्रस्ट भी करना होता है। इस तरह से फिल्म की कहानी काफी दिलचस्प है और हमें उम्मीद है कि ऑडियंस के सामने इस तरह की कहानी पहली बार आ रही है, जिसे उनका प्रतिसाद मिलना तय है।
यह आपकी दूसरी फिल्म है, इसका कोई खास कारण...?
(हां...) दरअसल, मेरे लिए कहानी बहुत मायने रखती है और मैं इस फिल्म में जो रोल कर रही हूं, उस कहानी पर मुझे काफी भरोसा है। वैसे तो कई सारी कहानियां हैं, जिनमें लड़कियों के साथ और उनके बगैर भी कहानी आगे बढ़ती है। लेकिन... (थोड़ा सोचते हुए अलग अंदाज में...) मुझे वैसे करनी नहीं थीं। मेरे लिए रोल बहुत इम्पॉर्टेंट था ...
मुझे सही रोल वाली फिल्म मिल नहीं रही थी तो मैने पहली फिल्म के बाद थिएटर्स ज्वाइन किए। मैंने कई सारे प्ले भी किए हैं, जिनसे अभिनय के लिहाज से काफी कुछ सीखने को मिला है। इस तरह से चल रहे जीवन में अचानक एक दिन 'भाग जॉनी का ऑफर मिला। (मुस्कान के साथ...) ऑडियंस देखगी कि ये पूरी कहानी तान्या के इर्द-गिर्द ही घूमती है, जो काफी सरहानीय रहेगा। (फिर जुदा मूड में...) यू नो, तो मुझे कुछ इसी तरह के रोल्स चाहिए होते हैं, जिनमें कुछ खास करने का मौका मिले। (...फिर थोड़ा रिलैक्स)। इसके अलावा मैं पेशेंस पर भरोसा रखती हूं और उम्मीद करती हूं कि इंडस्ट्री में कुछ बेहतर ही करने का मौका मिलता रहेगा।
फिल्म के निर्देशक शिवम नायर के बारे में आपका एक्सपीरिएंस कैसा रहा?
(कुछ सोचते हुए...) यू नो, वे इतने अलग टाइप के इंसान है कि सेट पर भी वे शॉट को देखते नहीं हैं, बल्कि सुनते हैं। अगर आवाज में दिल की गहराई नहीं आई तो शिवम जी बोलते थे कि नहीं, जोआ ये तुमने दिल से नहीं किया, फिर से करो... इस तरह से जब तक वे खुद संतुष्ट नहीं हो जाते थे, शॉट को ओके नहीं करते थे। यानी वे बहुत रियल टाइप इंसान हैं। मैं भौचक्की रह जाती थी कि आखिर उन्हें पता कैसे चल जाता है कि हमने कुछ सही नहीं किया है... (हाथों को हिलाते हुए... यानी) इस फिल्म में मुझे उनसे काफी कुछ सीखने का भरपूर मौका मिला, जो हमारे आगे करियर में काफी काम आने वाला है।
फिल्म के दौरान कुछ ऐसा... जिसे आप हमेशा याद रखने वाली हैं?
(सिर पर हाथ रखने हुए...) अरे बाप रे, फिल्म के एक शूट के दौरान कुणाल खेमू को पुलिस से बचते हुए दौड़ते ही दौड़ते एक नाव से छलांग मारकर चलती हुई दूसरी नाव पर पहुंचना था। इसके लिए वे कई बार शॉट क्लीयर भी कर चुके थे, एक सेफ्टी के परपज से उन्होंने फिर शूट किया और लेकिन दो एक्शन डायरेक्टर के चलते... जरा सी मिस अंडरस्टैंडिंग से वे दूसरी चलती हुई बोट पर जाने के बजाय पानी में गिर गए। (कुछ अलग अंदाज में...) खैर, यह तो ऊपर वाले का शुक्र है कि उनका सिर उस बोट से नहीं टकराया और टीम की चौकसी के चलते उन्हें पानी से बाहर निकाला गया... बस उनके पैर में ही चोट आई थी। इसके अलावा बताना चाहूंगी कि फिल्म में जो भी एक्शन किए गए हैं, वे सभी के ओरिजनल हैं और पूरी फिल्म में सिर्फ एक जगह ही केबल का सहारा लिया गया। (अब पानी पीती हैं...)
क्या आप पर्सनल से जुड़ा कुछ ऐसा बताना चाहेंगी, जिसे कम ही लोग जानते हों?
(थोड़ा मुस्कान भरे अंदाज में...) अब मैं 'अष्टांगा योगा (एक परंपरा की तरह योगा, यानी बिकुल टिपिकल पुराने जमाने का योगा, एक गुरू और शिष्य जैसे...) इस योगा को मैं बहुत ही पैशनेटली करती हूं, इस तरह से शायद मैं उस योगा की गहराईयों तक पहुंच गई हूं। (दोनों हाथों हिलाते हुए, खुशी से लबरेज...) यह मेरे लिए बहुत ही अलग चीज है, जिसे मैंने अभी हाल ही में टेकअप किया है। (कुछ अगल मूड में...) शायद इसे बहुत ही कम लोग जानते होंगे।
खैर, आपकी आगे की क्या रणनीति है?
(थोड़ा अलग अंदाज में...) वैसे तो हर एक्टर चाहता है कि उसे फिल्मों पर फिल्में मिलती रहें, लेकिन मैं फिलहाल थिएटर में ही बिजी हूं और अलग तरह की फिल्मों में काम करने की चाहत है। वैसे मैं बता दूं कि बृजेश हीर जी के साथ मैं 'ताज महल का उद्घाटन प्ले कर चुकी हूं। फिर गुलजार साहेब की 'पंच तंत्र। इसके बाद 'पासाÓ और 'न्यूक्लियर शेरÓ जैसी थिएटर कर चुकी हूं। साथ ही अभी हाल ही में हमने एक 'नागर जी की नगरियां प्ले कंप्लीट किया है। आगे मुझे सिर्फ और सिर्फ फिल्में ही करनी हैं। इसके अलावा थिएटर से भी जुड़े रहने की चाहत है, क्योंकि उससे मुझे अभिनय में काफी मदद मिल रही है...। फिलहाल तो बेहतरीन फिल्मों का बेसब्री से इंतजार है।