‘मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ: लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूँ?’

 16 Aug 2018  619

 वाजपेयी, जिनका आज 93 वर्ष की उम्र में निधन हो गया, केंद्र में पांच साल पूरे करने वाली गैर कांग्रेसी सरकार के पहले प्रधानमंत्री थे। 1996 में केंद्र की सत्ता में भाजपा की ताजपोशी वाजपेयी की कमान में ही हुई थी। हालांकि यह सत्ता मात्र 13 दिन की थी, क्योंकि गठबंधन सरकार अन्य दलों का समर्थन जुटाने में विफल रही थी। 

►करिश्माई व्यक्तित्व के बल पर आए सत्ता में
वाजपेयी के करिश्माई व्यक्तित्व के बल पर ही भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन की सरकार 1998 में फिर सत्ता में लौटी। अजब संयोग कहिए कि 13 दिन के बाद इस बार 13 महीने में सरकार अविश्वास प्रस्ताव की अग्नि परीक्षा को पास नहीं कर पाई और गिर गई। 

►ऐसे बने जन जन के प्रिय
अक्टूबर 1999 भाजपा के लिए काफी शुभ रहा और वाजपेयी का करिश्मा। इस बार भी चमत्कार करने में कामयाब रहा और वह फिर से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक सरकार 'राजग' के प्रधानमंत्री बने। इस बार उनकी सरकार ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। स्वतंत्रता सेनानी से शुरू होकर एक पत्रकार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता, संसद सदस्य, विदेश मंत्री, विपक्षी नेता तक का उनका राजनीतिक करियर एक ऐसे मोड़ पर आकर इतने गरिमामय तरीके से संपन्न हुआ कि वाजपेयी जन जन के प्रिय बन गए। 

►1942 में किया राजनीति में प्रवेश 
अपनी पीढ़ी के अन्य समकालीनों की तरह ही वाजपेयी ने मात्र 18 साल की उम्र में स्वतंत्रता आंदोलन के जरिए 1942 में राजनीति में प्रवेश किया । उस समय देश में भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था।

►जिंदगी भर रहे कुंवारे 
जिंदगी भर कुंवारे रहे वाजपेयी पहली बार 1957 में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से लोकसभा के लिए चुने गए थे। ये देश का दूसरा आम चुनाव था। संसद में अपने पहले ही भाषण से युवा नेता वाजपेयी ने अपने समकक्षों और वरिष्ठों का दिल जीत लिया। उनका भाषण इतना सारगर्भित था कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत यात्रा पर आए एक सम्मानित मेहमान के समक्ष उनका परिचय कुछ इस प्रकार दिया था, ‘ये युवा एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा।’ 

►47 सालों तक रहे सांसद
अटल बिहारी वाजपेयी 47 सालों तक संसद सदस्य रहे। दस बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के सदस्य के रूप में। भारतीय राजनीति में वाजपेयी एक प्रमुख हस्ताक्षर बनकर उभरे और राजनीति के उतार चढ़ावों के बीच उन्होंने ऐसी पद प्रतिष्ठा पायी कि न केवल उनकी अपनी पार्टी और सहयोगी दल बल्कि विपक्षी भी उनसे दिल खोलकर गले मिलते थे।

►अंग्रेजी के वह धाराप्रवाह वक्ता थे
अंग्रेजी के वह धाराप्रवाह वक्ता थे, लेकिन उनकी आत्मा हिंदी में बसती थी। जब वह हिंदी में अपने विशिष्ट अंदाज में लंबे अंतरालों के साथ भाषण देते थे तो लगता था उनकी जिह्वा पर देवी सरस्वती आ बैठी है। अपनी भाषण कला और उदात्त विचारों ने उन्हें आम जन, राजनेताओं और विश्व नेताओं का एक ऐसा चहेता नेता बना दिया था जिसकी छाया में सभी विचारधाराएं, सभी वाद और सर्वधर्म विश्राम पाता था। 

►रहे विदेश मंत्री
वह 1977 में मोरारजी देसाई की अगुवाई वाली जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री रहे। वह पहले नेता थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण दिया था। मार्च 2015 में उन्हें देश के सबसे उच्च और प्रतिष्ठित सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 

►करना पड़ा संकटों का सामना
केंद्र में उनके छह साल के कार्यकाल को कुछ संकटों का भी सामना करना पड़ा। 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण कर उसे अफगानिस्तान के कंधार ले जाने की घटना, साल 2001 में संसद पर हमला और साल 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक दंगे कुछ ऐसी ही घटनाएं थीं। 

►ढांचागत परियोजनाओं पर छोड़ी छाप
हालांकि उनकी सरकार ने देश की ढांचागत परियोजनाओं पर भी अपनी छाप छोड़ी। स्वर्ण चतुर्भुज राजमार्ग नेटवर्क सर्वाधिक सराहनीय रही, जिसके माध्यम से भारत के चार प्रमुख महानगरों को 5,846 किलोमीटर लंबे सड़क नेटवर्क से जोड़ा गया। 

►ऐसे जमाई दुनिया में धाक
विदेशों में एक महान राजनेता के तौर पर पहचान रखने वाले वाजपेयी का प्रधानमंत्री के रूप में 1998 से 1999 तक का कार्यकाल साहसिक कदम के लिए जाना जाता है। भारत ने उनके नेतृत्व में मई 1998 में राजस्थान के पोखरण रेंज में सफल परमाणु परीक्षण कर दुनिया में अपनी धाक जमा दी। इस परीक्षण के कारण भारत को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा किंतु वाजपेयी के कुशल नेतृत्व में देश उन अड़चनों से पार पा गया। साथ ही उन्होंने भविष्य में ऐसे किसी परीक्षण पर स्वत: रोक का भी ऐलान किया।

►इस तरह हुई एक युग की शुरुआत
इसके बाद शांति के मसीहा के रूप में वाजपेयी ने पाकिस्तान की ओर शांति का हाथ बढ़ाया। फरवरी 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच पहली बस में सवार होकर लाहौर पहुंचे। पड़ोसी के साथ शांति की ओर कदम बढ़ाने में उन्होंने पार्टी के आलोचकों की परवाह नहीं की। इस ऐतिहासिक यात्रा में देव आनंद जैसे अभिनेता उनके साथ गए थे। वहां प्रधानमंत्री ने तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात की। उनकी इस मुलाकात को दोनों देशों के संबंधों में एक नए युग की शुरूआत बताया गया।

►नहीं आए थे अगु्आनी में परवेज मुशर्रफ 
हालांकि पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ वाघा सीमा पर उनकी अगवानी करने नहीं आए। बहुत जल्द ही उनके न आने का कारण स्पष्ट हो गया था। 

►पाकिस्तान टेकने पड़े थे घुटने
पाकिस्तान ने दोहरा खेल खेलते हुए भारत पर करगिल युद्ध थोप दिया। वाजपेयी के कुशल नेतृत्व में देश की सेनाओं ने उसे करारा जवाब दिया। वाजपेयी के हौसले और कूटनीतिक कदमों के चलते पाकिस्तान को अपने घुसपैठिए वापस बुलाने पड़े। 


►कोशिश रही नाकाम
देश में वाजपेयी की जय जयकार के नारे गूंज उठे। लाहौर शांति पहल विफल होने पर वाजपेयी ने 2001 में जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ आगरा शिखर सम्मेलन के जरिए एक और कोशिश की, लेकिन वह भी नाकाम रही।