और पावरफुल बनेगी IAF, गरुण कमांडोज को कोवर्ट ऑपरेशंस के लिए मिलेंगे मिनी ड्रोन्स

 19 Sep 2015  1130
नई दिल्ली: इंडियन आर्मी की स्पेशल फोर्सेज को धीरे-धीरे लेटेस्ट टेकनीक और वेपंस से लैस किया जा रहा है। इसी क्रम में इंडियन एयरफोर्स के गरुण कमांडोज के लिए 65 अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स (यूएवी) या ड्रोन्स खरीदे जाएंगे। इसके लिए 27 करोड़ रुपए का कॉन्ट्रैक्ट किया गया है। इन ड्रोन्स के जरिए कमांडोज को कोवर्ट ऑपरेशंस में मदद मिलेगी। इन्फ्रारेड टेक्नोलॉजी से लैस बेहद हल्के इन ड्रोन्स की रेंज पांच किमी तक होगी। इन्हें कोवर्ट ऑपरेशंस के अलावा एयरबेसों के सर्विलांस और काउंटर टेररिज्म ऑपरेशंस में इस्तेमाल किया जा सकेगा। बता दें कि हाल ही में इंडियन आर्मी के लिए इजराइल मेड स्नाइपर राइफल और यूरोपियन अंडरवॉटर ओपन सर्किट डाइविंग इक्विपमेंट्स खरीदे गए हैं। वहीं, नेवी के मरीन कमांडोज के लिए दो सबमरीन के निर्माण की इजाजत मिल चुकी है। इसमें करीब 2017 करोड़ का खर्च आएगा।

सेना ने समझी ड्रोन की ताकत 
1999 में कारगिल की जंग के बाद से भारतीय सेना अभी तक 200 से ज्यादा यूएवी खरीद चुकी है। इनमें से अधिकतर इजराइल मेड हेरोन और सर्चर-2 हैं। इनका इस्तेमाल सर्विलांस के अलावा टार्गेट पर बेहतर ढंग से निशाना लगाने में होता है।
 
इंडियन एयरफोर्स के पास पहले से ही इजराइल मेड हेरोप 'किलर' ड्रोन्स हैं। ये टार्गेट का पता चलते ही मिसाइल की तरह काम करते हैं और उससे टकराकर फूट जाते हैं।
 
UCAVs (unmanned combat aerial vehicles) हासिल करने की कोशिश में सेना। ये ड्रोन्स टार्गेट पर मिसाइल फायर करने के बाद वापस बेस पर लौटते हैं। फिर से हथियारों से लैस होकर टार्गेट को निशाना बना सकते हैं।
 
कौन हैं गरुण कमांडोज 
एक दशक पहले अवंतिपुरा, श्रीनगर, गुवाहाटी में एयरफोर्स के एयरबेसों पर हुए आतंकी हमले के बाद गरुण कमांडोज पहली बार रोशनी में आए। इसे 2004 में बनाया गया था। इसमें करीब 2000 जवान हैं। फ्लाइट्स में ही ऑपरेट करने वाले गरुण कमांडोज की एक टुकड़ी में 60 लोग होते हैं। इन्हें हाई वैल्यू टार्गेट्स के अलावा दुश्मनों के रेडार, एयरक्राफ्ट वगैरह तबाह करने में महारत हासिल है। इसके अलावा, दुश्मन के इलाकों में फंसे पायलट्स को बचाने का भी काम करते हैं।
 
क्या होता है कोवर्ट ऑपरेशन 
एक ऐसा मिलिट्री ऑपरेशन जिसे बेहद खुफिया ढंग से प्लान और एग्जीक्यूट किया जाए। इसमें ऑपरेशंस को अंजाम देने वाली यूनिट से लेकर ऑपरेशन के लिए मंजूरी देने वाले, दोनों का पता नहीं चलता।