एक बेटी अपने पिता से कई सालों में मिले और वो भी उस स्थिति जिसकी उसने कल्पना भी न की हो। तो सोचो कैसा होगा वो मंजर जब उस बेटी ने अपने पिता को एक भिखारी की स्थिति देखा हो। अत्यंत पीढ़ा से भरा जिसकी हम कल्पना भी नही कर सकते।
कैसा लगा होगा उस बेटी को जब उसने अपने पिता को मानसिक रूप से बीमार होकर सड़कों पर भिखारियों की तरह भटकते देखा होगा। पर ये सच है ऐसा ही कुछ महसूस हुआ था अमेरिका की डायना किम को जब उन्होंने अपने पिता को इस अवस्था में देखा था।
लेकिन उन्होंने प्यार और समर्पण की एक मिसाल पेश करते हुए पिता को नई जिंदगी दी। और इस पूरी घटना में किम के पेशे यानी फोटोग्राफी ने अहम भूमिका अदा की। किम ने खुद अपनी कहानी दूसरों से शेयर की है क्यो न उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी सुनी जाए।
मेरे पिता फोटोग्राफर थे। मुझे कैमरा पकड़ना उन्हीं ने सिखाया। हमारा हंसता-खेलता परिवार उस समय बिखर गया जब मेरी आठ साल की उम्र में पिता घर छोड़कर चले गए। मेरा लड़कपन पिता के बगैर बीता। 2003 में मैंने यूनिवर्सिटी ऑफ हवाई में दाखिला लिया और बेघरों की फोटोग्राफी का प्रोजेक्ट शुरू किया। मैं उन बेघरों में खुद को देखती थी, क्योंकि पिता के छोड़कर जाने के बाद हमारा भी कोई घर नहीं था।
करीब तीन साल पहले, मेरी दादी का फोन आया कि पिता बीमार हैं और उनकी मानसिक स्थिति भी खराब हो गई है। मैं उन्हें देखने पहुंची। वे पागल भिखारी की तरह नजर आ रहे थे। बेहद कमजोर, बीमार, भिनभिनाती मक्खियों से घिरा शख्स। पूरे परिवार ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। वे जहां रहते थे, वहां से भी लोगों ने भगा दिया।
पढ़ाई जारी रखने के लिए पिता को जस-का-तस छोड़कर मुझे 2012 में वॉशिंगटन जाना पड़ा। इस साल गर्मी की छुट्टियों में लौटी तो पता चला कि पिता का कहीं अता-पता नहीं है। मैं पहले दिन से उनकी तलाश में जुट गई। बड़ी मशक्कत के बाद एक चौराहे पर खड़ा पाया। मैं पूरी तरह टूट गई। उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। आते-जाते लोग मुझे देख रहे थे। एक महिला ने बताया, ये तीन दिन से यहां ऐसे ही खड़े हैं।
उस दिन से मैं उनके पीछे चलने लगी। मुझे पता था, वे मेरी आंखों से ओझल हुए तो सबकुछ खत्म हो जाएगा। कई-कई हफ्ते ऐसे ही गुजर गए। कई बार तो मैं उनकी तरफ देख भी नहीं पाती थी, क्योंकि उनकी पीड़ा सहन नहीं कर पाती थी। फिर कैमरा थामने का ख्याल आया। पहले भी बेघरों की खूब तस्वीरें उतारीं, लेकिन इस बार एक लक्ष्य था। पिता आगे-आगे होते थे और कैमरा थामे मैं पीछे-पीछे चलती थी।
एक बार हफ्तों तक पिता का कोई पता नहीं चला। मैंने खूब खोजा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मन में डर बढ़ रहा था। तभी मेरे एक रिश्तेदार ने बताया कि मेरे नाम अस्पताल का बिल आया है। मैं बुरी तरह सहमी अस्पताल पहुंची। देखा पिता बिस्तर पर लेटे हैं। उन्होंने हार्टअटैक आया है। यहां से उनकी जिंदगी बदलना शुरू हो गई।
वे पहली बार भले ही अस्पताल के, लेकिन साफ-सुथरे कपड़ों में थे। इलाज के बाद उनकी सेहत भी सुधर रही थी। चेहरा साफ था। यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था। मैं सोचती थी, मेरे पिता नर्क जैसी जिंदगी में ही दम तोड़ देंगे। बहरहाल, अब मैंने उन्हें शेल्टर हाउस में शिफ्ट कर दिया है। रोज उनके पास जाती हूं।
अब उनका दिमाग भी ठीक रहता है। मैंने कम्प्युटर सिखाया दिया है। हाल ही में उन्होंने नौकरी का आवेदन लिखा है। मैंने अपना फोटोग्राफी प्रोजेक्ट दिखाया तो कहने लगे - फोटो को और अच्छे से फिनिश कर सकती थी। मैं पिता से और कुछ नहीं चाहती। सिर्फ यह चाहती हूं कि वे अपनी जिंदगी जिएं।