सरोकार- मुजफ्फरपुर : गिद्धों के बीच भी बची है संवेदना

 23 Jun 2019  613

अजय भट्टाचार्य

पॉलिटिक्स,(23 जून 2019)-पिछले सप्ताह यह यों कहिये कि एक पखवाड़े से मुजफ्फरपुर चर्चा में है। इससे पहले बंगाल में डाक्टरों से मारपीट के बाद डाक्टरों की देशव्यापी हड़ताल के बहाने मीडिया के निशाने पर बंगाल सरकार थी। इधर जैसे ही एक निजी चैनल ने मुजफ्फरपुर के श्री कृष्णा मेडिकल कालेज अस्पताल में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (चमकी बुखार) से मर रहे बच्चों की रपट दिखाई, दिल्ली के दिग्गज स्वयंभू चैनलों की नींद टूटी और खुद को सबसे तेज घोषित करने वाले चैनल की स्तर एंकर अस्पताल के सघन चिकित्सा कक्ष में डाक्टरों, नर्सों व अन्य मेडिकल स्टाफ से भिड़ी हुई थी मानो बच्चो में फैली जानलेवा बीमारी के कसूरवार यही वर्ग हो। सत्ता से जो सवाल पूछे जाने चाहिये वे सवाल अस्पताल के डाक्टरों और स्टाफ से पूछे जा रहे थे। एंकर के घडियाली आंसू टीवी स्क्रीन को तर कर रहे थे और चैनल की टीआरपी बढ़ने के सारे टट कर्म हो रहे थे। सोशल मीडिया पर एंकर की इस नाट्य प्रस्तुति की जो खिल्ली उडी वह मीडिया के चरित्र को रेखांकित करने के लिए विशेषकर डंडापकड़ पत्रकारिता के लिए बहुत कुछ सन्देश देती है। मीडिया के इस खेल को गिद्ध से जोड़ते हुए एक कुपोषित बच्चे और और उसके मरने की प्रतीक्षा में उसके पीछे गिद्ध की तस्वीर के साथ मीडिया की गिद्ध गति को परिभाषित किया गया।

द वल्चर एंड द लिटिल गर्ल नामक इस तस्वीर को एक दक्षिण अफ़्रीकी फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर ने 1993 में सूडान के अकाल के समय खींचा था और इसके लिए उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। लेकिन कार्टर इस सम्मान का आनंद कुछ ही दिन उठा पाए क्योंकि कुछ महीनों बाद 33 वर्ष की आयु में उन्होंने अवसाद से आत्महत्या कर ली थी । दरअसल जब वे इस सम्मान का जश्न मना रहे थे तो सारी दुनिया में प्रमुख चैनल और नेटवर्क पर इसकी चर्चा हो रही थी। उनका अवसाद तब शुरू हुआ जब एक 'फोन इंटरव्यू' के दौरान किसी ने पूछा कि उस लड़की का क्या हुआ? कार्टर ने कहा कि वह देखने के लिए रुके नहीं क्यों कि उन्हें फ्लाइट पकड़नी थी। इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि "मैं आपको बताना चाहता हूँ, कि उस दिन वहां दो गिद्ध थे जिसमें से एक के हाथ में कैमरा था!" इस कथन के भाव ने कार्टर को इतना विचलित कर दिया कि वे अवसाद में चले गये और अंत में आत्महत्या कर ली ।

किसी भी स्थिति में कुछ हासिल करने से पहले मानवता आनी ही चाहिए। कार्टर आज जीवित होते अगर वे उस बच्ची को उठा कर यूनाईटेड नेशन्स के फीडिंग सेंटर तक पहुँचा देते जहाँ पहुँचने की वह कोशिश कर रही थी। इस घटना के 26 सालो बाद,  ये कैमरे वाले गिद्ध मुजफ्फरपुर के अस्पतालों मे मंडरा रहे है। तस्वीरे खींच रहे है, अपने गंदे जूतो और कैमरो के साथ शोर मचाते हुए, अस्पताल के अति सघन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) मे घुसे जा रहे है। डाक्टरों पर रोब गालिब कर रहे है। जान बचाने की जद्दोजहद मे लगे डाक्टरो को हड़का रहे हैं। इन गिद्धो को मरने बच्चो से सरोकार नही है,  केवल चैनल की टीआरपी  और खबर मे मसाला डालकर चटपटा बनाना है। ये बच्चो के शवो को नोच कर खा जाने को आमादा गिद्ध हैं। केविन कार्टर में शर्म हया बची हुई थी , जिससे उसने आत्महत्या कर ली थी। मगर इन गिद्धो ने तो ईमान के साथ साथ आत्मा भी बेच खाई है। और पूरा देश ब्रैकिंग न्यूज देख रहा है।

पुष्यमित्र की फेसबुक वाल पर नमूदार हुई यह टिपण्णी भले ही मीडिया को विचलित न करे मगर मुजफ्फरपुर शहर के लोकल  न्यूज चैनल के रिपोर्टर आमिर भाई भी एक पत्रकार हैं। रिपोर्टिंग के दौरान उन्होंने देखा कि पानी टंकी चौक के निकट संदिग्ध एईएस से आक्रांत बच्चे को लेकर रो रही मां की कोई सहायता करने वाला नहीं। उस मां को पता भी नहीं था कि बच्चे को अस्पताल पहुंचाने का रास्ता कौन सा है। वे रिपोर्टिंग छोड़ मां और बच्चे  को बाइक पर लेकर केजरीवाल अस्पताल पहुंच गए। वहां उसे भर्ती कराया। उसका इलाज  शुरू कराया। जब बच्चे  की स्थिति में सुधार हुआ तब वहां से चले। सोंचिए अगर उनकी जगह दिल्ली  के नेशनल चैनल का पत्रकार होता तो क्या करता/करती। तड़प रहे बच्चे की मां के मुंह तक फोंफी (माइक) लगा कर कहता, कि देखिए हमारा समाज व सरकारी व्यवस्था कितना बेरहम है कि एंबुलेंस भी नहीं भेज रहा है। मौत की मुंह में जा रहे बच्चे  की पल-पल रिकार्डिंग करता। मां की आंसुओं  को अपने चैनल के टीआरपी में बदलता। अगले दिन इस पर चीख-चीख कर डिबेट कराता / कराती। प्रतिस्पर्धा  में आगे रहने को लेकर बहुत खुश होता/होती उसे व्यवस्था की पोल खोलने वाला बताकर जोर-जोर से ताली पीटने वाले लोग अन्य को प्रतिस्पर्धा से पिछड़ने को लेकर दुखी बताते। लेकिन टीआरपी प्रतिस्पर्धा की परवाह नहीं कर आमिर भाई ने बता दिया कि बच्चे  की जिंदगी के सामने टीआरपी कुछ नहीं। दरअसल आमिर ने मरती जा रही सरोकारी पत्रकारिता सिर ऊंचा कर दिया। आमिर की तरह ही रांची के आनन्द दत्ता की भी एक बेहतरीन पत्रकार और फोटोग्राफर हैं। चमकी बुखार के खिलाफ जागरुकता अभियान में जितना पैसा जमा हुआ उसमें ज्यादातर इनकी वजह से हुआ। पैसा लेकर रांची से चले, सुबह मुजफ्फरपुर पहुंचे। एसकेएमसीएच में कैम्प किया। पहले मरीज के परिजनों के लिये खाने का इन्तजाम कराया। फिर पीने के पानी की व्यवस्था में जुट गये। दो प्यूरिफायर लगवा चुके हैं। तीसरा लगवा रहे हैं। इस बीच इनकी नजर गयी कि अस्पताल परिसर में 13-14 प्यूरिफायर पहले से लगे हैं, जो छोटी छोटी गड़बड़ी की वजह से बन्द हैं, सो उनको ठीक कराने में जुट गये। नजर गयी कि परिजनों के बैठने की जगह लगे कई पंखे खराब हैं, इसके लिये मिस्त्री बुला रहे हैं। मुश्किल से 70-80 हजार रुपये खर्च हुए होंगे, इन्होने मरीज के परिजनों के खाने-पीने और इस भीषण गर्मी में चैन से बैठने की व्यवस्था कर दी है। जबकि इस दौरान रोज यहां नेता मन्त्री और मुख्यमंत्री आते रहे हैं, इस छोटी बातों पर किसी की नजर नहीं गयी। इस पत्रकार को एक सलाम तो बनता है।

गोरखपुर के डॉ. कफील याद हैं आपको? 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी सरकार की ताजपोशी के बाद गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से हुयी बच्चों की मौत के सिलसिले में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। क्योंकि शासन-प्रशासन को ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करनी होती है और यह जवाबदेही सरकार खुद न लेकर सम्बंधित अस्पताल में और उससे सम्बद्ध लोगों में तलाश कर ही लेती है। डॉ. कफील इसी जवाबदेही के गुनाहगार ठहराए गए और सात-आठ माह जेल में बिताकर जैसे ही रिहा हुए अगले दिन उन्हें फिर नौ साल पुराने धोखाधड़ी के मामले में पकड़कर जेल में ठूंस दिया गया। वही डॉ. कफील इन दिनों मुजफ्फरपुर में दवाओं और अन्य जरुरी मेडिकल ताम-झाम के एक शिविर लगाकर चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों का इलाज कर रहे हैं और लोगों को इस बीमारी से बचने के उपाय भी बता रहे हैं। ऐसे अन्य लोग भी होंगे जो अपनी क्षमतानुसार मुजफ्फरपुर की त्रासदी में भी अपनी सकारात्मक भूमिका को बिना किसी प्रचार के तय कर अपना काम कर रहे हैं। वे क्रिकेट का स्कोर नहीं पूछ रहे, वे चमकी बुखार के सवाल से भाग नहीं रहे, उनके पास शिखर धवन के चोटिल अंगूठे पर प्रधानसेवक की चिंता वाला ट्वीट पढ़ने का समय भी नहीं है जिसे मुख्यधारा का मीडिया प्रधानसेवक की संवेदनशीलता का अनूठा उदाहरण बताकर पेश कर स्तुतिगान की पीठिका लिख रहा है। लेकिन मीडिया मुजफ्फरपुर कांड पर प्रधानसेवक की    चुप्पी को विपश्यना भाव से देखते हुए जय-जयकार में लीन है। मुजफ्फरपुर में मंडरा रहे गिद्धों की नजर में आमिर, आनंद दत्ता और डॉ. कफील के सद्प्रयास बेमानी हैं।

दरअसल सरकार की नाकामियों पर पर्दा डालकर मुख्यधारा का मीडिया सत्ता का मुखौटा बनकर कार्य करता हुआ प्रतीत हो रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप में निरक्षर और गरीब जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं है। उसी का फायदा उठाते हुए सत्ता निरंकुश राजशाही की तरह व्यवहार करती है और मीडिया अपनी भूमिका भूलकर गुलामी व माल बंटवारे की बेईमान आदतों के कारण विश्वसनीयता खोता जा रहा है। भारत में अब पूंजीवादी घरानों के पास मीडिया है और पूंजी व मीडिया के माध्यम से सत्ता को हांकने की लगाम अपने हाथ में ले चुके है। ऐसे में यह उम्मीद करना बेमानी है कि मुख्यधारा का मीडिया जनता के बुनियादी मुद्दों को लेकर प्राइम टाइम करेगा। श्रेष्ठी वर्ग से व्यापारी वर्ग की तरफ मीडिया का स्थलांतरण जरूर हुआ है। लेकिन  जनता के मुद्दों पर मीडिया हमेशा की भांति खामोशी की चादर ओढ़कर चल रहा है। मुजफ्फपुर इसका सटीक उदाहरण है।