सरोकार- नए भारत का मीडिया शास्त्र !

 18 Jun 2019  607

अजय भट्टाचार्य

पॉलिटिक्स,(16 जून 2019)- बात शुरू करते हैं अलीगढ़ से। द प्रिंट की रिपोर्टर ज्योति यादव ने लिखा है, “अलीगढ़ से रिपोर्टिंग करके लौट रही हूँ। टप्पल गाँव में फ़रीदाबाद, गुरूग्राम और दिल्ली से भर-भर कर गाड़ियाँ जा रही हैं। गाँव में हज़ारों की संख्या में सीआरपीएफ और पुलिस वाले इन बाहरी युवकों को खदेड़ रहे हैं। दंगे की स्थिति हो गई। मुँह पर भगवा कपड़ा बांधे किसी विशेष समुदाय से बदला लेने की बात करते हुए जय श्री राम के नारे लगा रहे हैं। कई सेना के जवानों से ही भिड़ जा रहे हैं। इनकी गाड़ियों को हाईवे पर ही रोका भी जा रहा है। इलाक़े में कर्फ़्यू जैसे हालात हैं। ट्विंकल के घर के सामने शोक सभा में कोई टीका लगाए हुए हिंदू आता है और सबको किसी अलग भाषा में कुछ समझा रहा है। अंदर ट्विंकल के पापा मुझसे कह रहे हैं कि हम इन लोगों की बातों में नहीं आ रहे हैं। ट्विंकल की माँ दस दिन से खाना छोड़े बैठी हैं। माता-पिता चाहते हैं दोषियों को फाँसी की सज़ा हो। मुस्लिम परिवार भी यही कह रहे हैं कि दोषियों को फाँसी से भी ऊपर की सज़ा हो। वो हमारी भी बच्ची थी। लेकिन बाहर से आए इन युवकों को सजा से ज्यादा कुछ और चाहिए। ये दंगा चाहते हैं। मैं एक दंगे की स्थिति से निकल आ रही हूं। मुझसे तीन बार पूछा गया कि अपनी आईडी कार्ड भगवा रुमाल बांधे युवक को दिखाऊं। क्यों? क्या वो पुलिस है? प्रशासन है? कौन है ये भीड़? एक और जगह भीड़ से निकलकर एक युवक मुझसे रिपोर्टिंग ना करने और वीडियो ना बनाने की बात धमकी भरे लहजे में कहने आया। पास खड़े ग्रामीणों ने धमकाया तो माना। हजारों की संख्या में खड़ी पुलिस को देखकर भी इन्हें खौफ नहीं है। ये पत्रकारों को धमका रहे हैं कि किस तरह की पत्रकारिता करनी चाहिए। ये रुमाल बांधे भीड़ ही अब पुलिस है, जज है, वकील है और यही अब न्याय करेगी।“

यह उस समय की पोस्ट है जब पश्चिम बंगाल में डॉक्टर की पिटाई नहीं हुई थी और कठुआ मामले पर अदालत का फैसला नहीं आया था। कठुआ पर फैसला आते ही टप्पल गाँव की ट्विंकल के अपराधियों को सारे आम सजा देने की उन्मादी भीड़ का उत्साह कुछ ठंडा पड़ा। वे टीवी चैनल और जम्मू-कश्मीर के छत्रप जो कठुआ कांड को सिरे से ख़ारिज कर रहे थे, उनको जैसे सांप सूंघ गया। उत्तर प्रदेश के एक अग्रणी हिंदी अख़बार ने गोदी मीडिया के नशे में कठुआ में बलात्कार नहीं हुआ था को मुख प्रष्ठ पर छापा था उसी अख़बार ने फैसले को भी प्रमुख प्रष्ठ पर ही छापा। अब यह तय करना बाकी है कि जब कठुआ में बलात्कार हुआ ही नहीं तो दोषियों को सजा कैसे हो गयी? यानि कठुआ का मीडिया ट्रायल साफ सन्देश है कि अब हम किसी अपराध को भी हिन्दू-मुस्लिम के चश्मे के बिना नहीं देख सकते। अलीगढ़ में जमा भीड़ लखनऊ के मडियांव इलाके में 12 साल की उस बच्ची की चीख नहीं सुन पा रही होती है जो अपने ही मामा की हवस का शिकार हुई। क्यों ? क्योंकि मामा कंस देश के संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदार संगठन आरएसएस से जुड़े हैं। इस घटना का दुखद पहलू यह है कि आरोपी धर्मेंद्र प्रताप सिंह पेशे से वकील है। पिछले रविवार को उस बच्ची ने अपनी माँ से फोन पर बात की और घर वापस बुलाने की मांग की। बच्ची के पिता सीतापुर से मडियांव पहुंचे और बच्ची को लेकर सीधे थाने पहुंची। पिता की तहरीर पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने आरोपी वकील को गिरफतार कर लिया। पीड़ित बच्ची के पिता ने एफआईआर में जो लिखा है कि उनकी बेटी ने दोपहर तीन बजे फोन कर घर वापस ले जाने को कहा। जब वे उसे लेने पहुंचे तो बच्ची ने लाज-शर्म और डर के कारण कुछ नहीं बताया। घर पहुँच कर बच्ची ने अपनी माँ से अपनी वेदना कही तब अगले दिन पिता बच्ची को लेकर पुलिस थाने पहुंचे। शिकायत मिलने पर पुलिस निरीक्षक राजेश द्विवेदी ने जाँच संभाली और आरोपी को गिरफ्तार किया। आरोपी को गिरफ्तारी की आशंका थी इसलिए उसकी गिरफ्तारी को रोकने की कोशिश में लोग जुटे भी मगर जब उनको पता चला कि वकील साहब ने अपनी ही भांजी को रौंदा है तब वे वापस हो लिए। यहाँ इसका कतई यह अर्थ नहीं है कि अलीगढ़ और मडियांव की घटनाओं में दोषियों को धार्मिक आधार पर मामले को कम या ज्यादा उठाना सही है या गलत लेकिन एक सवाल तो बनता ही है कि 13 जून को जब वकील गिरफ्तार हुआ तब उसकी गिरफ्तारी के कारणों पर किसी चैनल पर बहस नहीं हो रही थी। हम वास्तव में नए भारत का मीडिया शास्त्र गढ़/पढ़ रहे हैं!

ऐसा क्यों है? वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल लिखते हैं- “यूपी में हिंसा, हत्या, बेहाली, बर्बरता और शासकीय-दमन(पत्रकार सहित) बड़ी खबर नहीं! खबर में सिर्फ बंगाल रहना चाहिए! बीच-बीच में कश्मीर भी! चाहो तो समुद्री तूफ़ान दिखाओ, क्रिकेट का उफान या चंद्रयान की भावी उड़ान! आगरा में यूपी बार कौंसिल की पहली महिला अध्यक्ष दरवेश यादव की उनके निर्वाचन के महज दो दिन बाद कोर्ट परिसर में ही हत्या हो जाती है। पर बड़े न्यूज चैनलों के लिए खबर ज्यादा बड़ी नहीं लगती। 12 जून की शाम, देश के कई बड़े हिन्दी न्यूज़ चैनल 'हिन्दू-मुसलमान डिबेट' या बंगाल में प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस दिखाने में जुटे हैं। कुछ तटीय क्षेत्र पहुंच कर आने वाले समुद्री तूफ़ान से निपटने की तैयारी भी दिखा रहे हैं। 'अंग्रेजी वाले कई लिबरल्स' नीरव मोदी या क्रिकेट पर टिके हुए हैं। पर बगल के आगरा जाने की किसी को फुर्सत नहीं, जहां प्रदेश बार कौंसिल की एक महिला-अध्यक्ष की नृशंस हत्या कर दी गई। 'रामराज' को 'जंगलराज' कहने की जुर्रत कौन करे?

क्या किसी ने गिनती की, लोकसभा चुनाव के बाद यूपी में अब तक कितनी राजनीतिक रंजिश से जुड़ी हत्याएं हुईं? चुनाव-बाद हिंसा के नाम पर बंगाल सुर्खियों में है क्योंकि 'निजाम' की यह जरुरत है। पर यूपी की चुनाव-बाद हत्याओं पर रहस्यमय आपराधिक-खामोशी। 'निजाम' खामोशी चाहता है तो कौन बोले? उस अमेठी वाली हत्या पर भी अब कोई खबर नहीं, जिसे एक समय जोर-शोर से दिखाया गया था। चुनाव-बाद गाजीपुर सहित यूपी की ज्यादातर हत्याएं कभी खबर ही नहीं बनीं।

हत्या की खबर दिखानी है तो सिर्फ बंगाल और कश्मीर की दिखाओ, और कहीं दिखाने का क्या मतलब? लोग देखना भी नहीं चाहेंगे, इतना बड़ा बहुमत जो मिला है। 'बहुमत वालों' के इलाके की 'निगेटिव' खबर क्यों दिखाएं?

अभी सोमवार को झांसी के पास केरल एक्सप्रेस में यात्रा कर रहे चार गरीब यात्रियों की मौत हो गई। वे साधारण बोगी में ठुंसे पड़े थे। हवा-पानी की कमी और बेहाली ने उन्हें सफर पूरा नहीं करने दिया। उनकी जिंदगी का ही सफर पूरा हो गया। क्या यह खबर आपने देश के 'राष्ट्रीय' या 'क्षेत्रीय' कहे जाने वाले न्यूज चैनलों पर प्रमुखता से देखी? इस पर कोई गंभीर डिबेट सुनी? फिर वो प्रदेश बार कौंसिल की महिला अध्यक्ष की नृशंस हत्या को भला बड़ी खबर क्यों मानेंगे?  और हां, 'रामराज' को 'जंगलराज' कहने की जुर्रत नहीं करना! घोर पाप लगेगा, नौकरी और विज्ञापन, दोनों का संकट ! और मोहल्ले में 'देशद्रोही' कहलाने का खतरा अलग से। मीडिया का 'न्यू इंडिया शास्त्र' !”

तो क्या यह कहा जाये कि नए भारत का मीडिया शास्त्र बदल रहा है या सचमुच बदल चुका है? सवाल इसलिए भी उठता है कि शनिवार को ही गुजरात के वड़ोदरा जिले की दाभोई तहसील स्थित फरतीकुई गाँव में चार सफाई कर्मियों सहित सात लोग तब मौत का शिकार हो गये जब वे दर्शन होटल के सेफ्टी टैंक की सफाई करने उतरे थे। मुंबई में गुजरातियों की खासी संख्या है लेकिन किसी भी हिंदी चैनल या अख़बार में यह खबर नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि इससे गुजरात मॉडल के बहुप्रचारित-प्रसारित स्वर्ग की असलियत सामने आ जाएगी। वड़ोदरा से 35 किमी दूर हुई इस दुर्घटना में थुवावी से बुलाये गये महेश पाटनवाडिया, अशोक हरिजन, महेश हरिजन और बृजेश हरिजन नामक सफाई मजदूर अपनी जान गँवा बैठे। उनके साथ होटल के तीन कर्मचारी अजय वसावा, विजय चौहान और सहदेव वसावा भी मौत का शिकार बने। ये तीनों 22 से 24 वर्ष के थे। मीडिया से कोई आवाज नहीं उठती कि मूर्ति पर तीन हजार करोड़ खर्च कर घमंड में फूली सरकार अभी तक ऐसा तंत्र क्यों नहीं विकसित कर पाई जिसमें नालों ओए सेफ्टी टैंकों की सफाई मशीनों से की जा सके? और यह भी पूछने की कोई जरुरत नहीं समझता कि 182 फीट ऊँची मूर्ति बन सकती है तो 50 फीट ऊँची सीढ़ीयुक्त राहत वाहन सूरत फायर ब्रिगेड को क्यों नहीं मिला ताकि कोचिंग सेंटर में आग में जलकर मरने से बच्चे बचाए जा सकते। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि पिछले साल सितंबर में सफाई कर्मचारी आंदोलन नामक एक गैर सरकारी संगठन ने रिपोर्ट जारी की थी जिसके अनुसार हर तीसरे दिन एक सफाई मजदूर की मौत ऐसी ही घटनाओं में होती है। जनवरी 2017 से सितंबर 2018 तक पूरे देश में 221 सफाईकर्मी इस तरह की दुर्घटनाओं का शिकार हुए हैं। दुखद यह भी है कि सफाई कर्मियों को लेकर बने राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट जहाँ 666 सफाई मजदूरों की दुर्घटना मृत्यु बताती है वहीँ सफाई कामगार आंदोलन का कहना है कि 1993 से अब तक संघ शासित राज्यों सहित कुल 16 राज्यों के आंकड़ों के अनुसार 1760 लोग इस तरह की दुर्घटनाओं का शिकार हुए हैं। उम्मीद कीजिये कि मीडिया तन्द्रा से बाहर आये और हिन्दू-मुस्लिम के सिवा भी भारत है, को सामने लाये।