अजय भट्टाचार्य
करेंट अफेयर्स,(26 मई 2019)-पांचाली की एक उपहास भरी हंसी के कारण महाभारत हो गया था यह सभी जानते हैं। मगर गुना से चुनाव हारे दिग्गज कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार पांचाली की उपहास भरी ठिठोली को जोडकर देखा जा रहा है। यह अलग बात है कि यह ठिठोली ज्योतिरादित्य की पत्नी ने की। एक निजी चैनल के पोर्टल पर प्रकाशित खबर का सार यह है कि जूनियर सिंधिया को हराने वाले भाजपा उम्मीदवार के. पी. यादव का परिवार लंबे समय से राजनीति में है। उनके पिता रघुवीर सिंह यादव चार बार गुना ज़िला पंचायत अध्यक्ष रहे थे। 2004 से केपी सक्रिय राजनीति में आए। सिंधिया के खास हुए, सांसद प्रतिनिधि भी बने। अब विधायक बनने की बारी थी। महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा के निधन के बाद मुंगावली से उपचुनाव की बारी आई। के. पी. यादव टिकट के दावेदार थे और इलाके में पहले से सक्रिय थे। क्योंकि वो मानकर चल रहे थे कि टिकट उन्हें ही मिलेगा। लेकिन टिकट चला गया बृजेन्द्र सिंह यादव को। केपी यादव ने नाराज़ होकर अपने पिता की पार्टी छोड़ दी। बृजेन्द्र सिंह यादव उपचुनाव जीत गए और 2018 के विधानसभा चुनाव के लिए मुंगावली से कांग्रेस प्रत्याशी भी बने। भाजपा ने के. पी. यादव को हिसाब बराबर करने का मौका दिया – मुंगावली से प्रत्याशी बनाकर। लेकिन इस सीट पर कांग्रेस परंपरागत रूप से मज़बूत रही है और यादव फिर करीबी अंतर से हार गए। इसके बाद आए लोकसभा चुनाव जिसमें भाजपा ने पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर के. पी. यादव को एक मौका और दिया। इस बार पुराने बॉस ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ। सबने कहा कि एक हारा हुआ विधायक चार बार के सांसद और सिंधिया घराने के वारिस को कैसे हरा देगा। लेकिन राजनीति में एक और एक मिलकर ग्यारह भी होते हैं। के. पी. यादव जीत गए। उनके जीतते ही एक तस्वीर वायरल हुयी जिसमें कहा गया था कि कभी सिंधिया के साथ सेल्फी लेने के लिए जद्दोजहद करने वाला आज सिंधिया को ही पछाडकर सांसद बन गया। अब बात आती है उस व्यंग्य की जो ज्योतिरादित्य की पत्नी ने तब किया था जब के. पी. यादव भाजपा के उम्मीदवार घोषित किये गए थे। इस वायरल पोस्ट में तस्वीर में गाड़ी के बैठे ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ गाड़ी के बाहर से सेल्फी ले रहे के. पी. यादव दिख रहे हैं/थे। तस्वीर के साथ प्रियदर्शिनी ने जो लिखा उसका सार यही था कि जो कभी महाराज के साथ सेल्फी लेने की लाइन में रहते थे, उन्हें भाजपा ने अपना प्रत्याशी चुना है। प्रियदर्शिनी ने ये पोस्ट करने से पहले एक बार भी यह नहीं सोचा था कि कभी महाराज के सांसद प्रतिनिधि रहने वाले के. पी. यादव ही उनके लिए राजनीतिक सूर्यास्त का कारण बनेंगे। ज्योतिरादित्य सिंधिया पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी बनाए गए थे तो काफी वक्त उप्र में ही रहे। उनका प्रचार उनकी पत्नी प्रियदर्शनी राजे सिंधिया संभाल रही थीं। जब आखिरी हफ्ते में लौटे तो बहुत देर हो चुकी थी। प्रियदर्शिनी की पोस्ट के साथ शिवराज का एक बयान भी याद आता है। एक सभा में उन्होंने के. पी. यादव को विभीषण बातकर कहा था कि अब भाजपा लंका फतह कर लेगी। यह अलग बात है कि विभीषण की उपमा प्रशंसा में बहुत कम दी जाती है।
►रायगड क्यों हारे गीते?
इसी स्तम्भ में 29 अप्रैल को जब महाराष्ट्र की रायगड लोकसभा सीट पर चर्चा की गयी थी। शिवसेना के अनंत गंगाराम गीते पिछली बार यहाँ से जीते थे। तब उनके सामने राष्ट्रवादी कांग्रेस के बड़े नेता सुनील दत्तात्रय तटकरे महज 2110 मतों से चुनाव हारे थे। लेकिन इस बार सुनील दत्तात्रय तटकरे जीत गए हैं। पिछली बार उनकी हार की वजह का विश्लेषण करने पर पता चला कि उनके सामने एक और सुनील सखाराम तटकरे बतौर निर्दलीय चुनाव लड़े थे और 9700 वोट पाकर सुनील दत्तात्रय तटकरे की जीत में रुकावट बने थे। वे इस बार भी मैदान में थे और 9752 मत काटने के बावजूद गीते को जिता नहीं पाए। पिछली बार की तरह एक और सुनील पांडुरंग तटकरे रायगड आये और 4126 मत पाये। पिछले चुनाव में अनंत गंगाराम गीते को 396178 और सुनील दत्तात्रय तटकरे को 394068 मत मिले थे जबकि शेतकरी कामगार पक्ष के रमेशभाई कदम को 129730 मत मिले थे। इस बार शेकाप मैदान में नहीं थी और नतीजा यह रहा कि गीते 455530 मत पाकर भी 31438 मतों से हार गए। सुनील दत्तात्रय तटकरे को 486968 मत मिले। वैसे राजनीति के जानकार बताते हैं कि वंचित बहुजन आघाडी के उम्मीदवार सुमन भास्कर कोली को लाया ही इसलिए गया था कि शेकाप की कमी पूरी कर सकें लेकिन उनको केवल 23196 मत मिले। इस सीट पर हुए दंगल में कुल 16 उम्मीदवार थे। आश्चर्यजनक यह भी है कि नोटा में 11490 मत पड़े। इनसे किसका खेल बिगड़ा यह शोध का विषय है।
►भाजपा के राजभर
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के नेता ओम प्रकाश राजभर की योगी सरकार से विदाई के साथ ही यह सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि आखिर 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा इस जाति की भरपाई कैसे करेगी? वैसे भाजपा ने ओम प्रकाश राजभर के बगावती तेवर को देखते हुए पहले से ही डैमेज कंट्रोल के लिए प्लान बी तैयार कर रखा था। प्रदेश में भाजपा के पास तीन बड़े राजभर नेता हैं, जिनके जरिए पूर्वांचल के इस वोटबैंक को साधने की कोशिश होगी। ओम प्रकाश राजभर खुद को उत्तर प्रदेश में राजभर समाज के बीच अकेले नेता के तौर पर खुद को पेश करते रहे। साथ ही सरकार में रहते हुए उसे आंख भी दिखाते रहे। ऐसे में भाजपा ने इस समाज के अपने नेताओं को भी महत्व देकर आगे लाना शुरू किया। अनिल राजभर को होमगार्ड राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया। घोसी से सांसद हरि नारायण राजभर को इस बार फिर से टिकट दिया। यही नहीं बलिया के रहने वाले संघ कार्यकर्ता सकलदीप राजभर को राज्यसभा भेजा। मकसद था गाजीपुर, मऊ, घोसी, बलिया, अंडेकरनगर, इलाहाबाद, वाराणसी और चंदौली में 10 फीसदी राजभर आबादी को साधने का। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अब इन्हीं तीन नेताओं के जरिए भाजपा इस समाज को साधेगी। दिसंबर 2018 में केंद्र सरकार ने महाराज सुहेलदेव के नाम पर डाक टिकट जारी किया था। इस कार्यक्रम में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गाजीपुर पहुंचे थे तब ओम प्रकाश राजभर ने इस कार्यक्रम का बहिष्कार किया था।
►कैप्टन नंबर वन
कांग्रेस शासित राज्यों पंजाब, मध्यप्रदेश, राजस्थान व गुजरात की कुल 78 लोकसभा सीटों में सबसे अच्छा प्रदर्शन पंजाब का रहा है। पंजाब में 'मोदी लहर' को दरकिनार करते हुए कांग्रेस ने 13 में से 8 सीटों पर जीत हासिल की। इस जीत ने ना केवल पार्टी को बड़ी राहत मिली बल्कि पंजाब में एक नेता के राजनीतिक कद में जबरदस्त इजाफा हुआ। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में पार्टी ने मिशन-13 के तहत पंजाब में खूब प्रचार किया था और अमरिंदर सिंह ने कैप्टन की भूमिका बखूबी निभाई। इसके उलट राजस्थान की सभी 25 सीटें भाजपा के खाते में गईं। मध्यप्रदेश की 29 में मात्र एक सीट ही कांग्रेस की झोली में आई। छतीसगढ़ की 11 सीटों में कांग्रेस सिर्फ दो सीटें ही जीत पाई। कहा जा सकता है कि कांग्रेस के राजस्थान, मप्र और छग के कप्तान क्रमश: अशोक गहलोत, कमल नाथ और भूपेश बघेल का प्रदर्शन फिसड्डी साबित हुआ है।
►अपने न हुए अपने
लोकसभा चुनाव 2019 के जनादेश हैरान करने वाले हैं। इस चुनाव परिणाम ने ऐसी भी स्थिति दिखाई है कि कहीं-कहीं मानवीय रिश्ते भी राजनीति की भेंट चढ़ गए। जरा सोचिये कि चुनावी रण में उतरे प्रत्याशी को उसके अपने ही घर वाले वोट न दें तो वह क्या करेगा? पंजाब की जालंधर सीट से एक निर्दलीय उम्मीदवार को चुनावी नतीजों से गहरा धक्का लगा, क्योंकि उन्हें अपनों ने ही भुला दिया।
निर्दलीय प्रत्याशी नीतू शटर्न वाला के घर में 9 सदस्य हैं, लेकिन इन्हें सिर्फ पांच वोट मिले। यानी परिवार के सदस्यों ने भी उनके पक्ष में वोटिंग नहीं की। चुनाव परिणाम आने के बाद वह फूट-फूट कर रोने लगे। जब इस बारे में उम्मीदवार से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने अपनी हार से ज्यादा पारिवारिक मतभेद से दुखी होने की बात कही। इसके बाद वो कैमरे के सामने ही रो पड़े। जब ये जानकारी आम जनता के बीच पहुंची, तो वह और भी भावुक हो गए। सोशल मीडिया पर इस उम्मीदवार की वायरल वीडियो खूब शेयर किया गया।
►भाजपा का अगला अध्यक्ष कौन
नई सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में वर्तमान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी अगर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलती है तो अगला अध्यक्ष कौन होगा? जाहिर तौर पर पिछली बार अध्यक्ष बनते-बनते रह गये जे. पी. नड्डा का नाम आगे चलना स्वाभाविक है। खासकर उत्तर प्रदेश प्रभारी के तौर पर उनका प्रदर्शन। लेकिन भाजपा के अंत:पुर से आ रही खबरों के अनुसार पार्टी के पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय भी अगले भाजपा अध्यक्ष हो सकते हैं।
पुछल्ला : अंतत: राहुल गाँधी ने इस्तीफे की पेशकश की लेकिन कार्यसमिति से मंजूर नहीं किया। चित्त पट दोनों अपनी।