सरोकार- गाली गलौज के दौर में राजनीति

 12 May 2019  715

अजय भट्टाचार्य

करेंट अफेयर्स, (12 मई 2019)- इस लोकसभा चुनाव में पिछला सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गलियों को समर्पित कर दिया। चुनाव प्रचार के मंच से उन्होंने विपक्षी नेताओं द्वारा उनके संबंध/सन्दर्भ में इस्तेमाल किये गए विशेषणों को अपशब्दों की श्रेणी में रखकर यह जाहिर करने की कोशिश की, (और ऐसा वे करते भी रहे हैं) कि सारे विपक्षी उन्हें इसलिए निशाना बनाते हैं क्योंकि वे ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं और इससे उनके विरोधी परेशान हैं। अपने आप को ईमानदार साबित करने की यह कला हर नेता की विशेषता होती है।  चूँकि यहाँ सन्दर्भ गलियों को लेकर है तो यह चलन कब से बढ़ा है यह मोदीजी भली भांति जानते हैं।  अंतर सिर्फ इतना है कि जब वे विपक्ष की नेत्री को जर्सी गाय से विभूषित करें तब उनको यह शब्द गाली नहीं लगता। वे और उनके समर्थक विपक्ष की नेत्री को बार बाला कहकर अट्टहास करें तब ठीक है। किसी इन्सान की मौत की तुलना गाड़ी से कुचलकर मरे कुत्ते से करना उनकी दृष्टि में सभ्य है। उनके एक प्रदेशाध्यक्ष विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष को मंच से खुल्लम-खुल्ला माँ की गाली दें और प्रधानमंत्री मौन रहें, तब क्या कहना और क्या सोचना चाहिये।    
सबलोग में मणीन्द्रनाथ ठाकुर लिखते हैं कि दरअसल जब नेता अमर्यादित भाषा बोलने लगें तो समझना चाहिए कि उनके पास जनता को देने के लिए कुछ भी नहीं है। जनता को भी बात समझ में आ गयी है कि वादे केवल जुमले हैं और शायद जनता उससे आकर्षित भी नहीं होती है। फिर उन्हें आकर्षित कैसे करें? इसके लिए शुरू में तो बार-बालाओं और सिनेमा के दिग्गजों को भी मैदान में उतारा जाने लगा, लेकिन अब जनता उससे भी ऊब चुकी है। दरअसल अब गालियाँ मनोरंजन उद्योग में साधन के रूप में उपयोग हो रही हैं। लोकप्रिय  सिनेमा या सीरियलों में इनकी बानगी देखी जा सकती है। पिछले साल आई फिल्म मोहल्ला अस्सी इसका उदहारण है। गैंग्स ऑफ वासेपुर की व्यावसायिक सफलता के बाद से बॉलीवुड के निर्देशक निर्माता यह समझ गये हैं कि जनता का मनोरंजन हिंसा और गालियों से भी किया जा सकता है। अभी नेटफ़्लिक्स पर सबसे लोकप्रिय हो रहे सीरीयल सेक्रेड गेम्स में हर तरह की गालियाँ सुनी जा सकती हैं। अमेज़ोन पर दूसरा सीरियल ‘मिर्ज़ापुर’ भी गाली और हिंसा से भरा हुआ है। निर्देशकों ने फार्मूला पकड़ लिया है। खूब सारी हिंसा, उसका ग्राफ़िक डिटेल, सेक्स और सबसे ज़्यादा गालियाँ। एक और मनोरंजन का साधन आजकल प्रचलित हो रहा है जिसे ‘स्टैंड अप कमेडी’ कहा जा रहा है। बस कुछ नक़ल, कुछ अकल और ज़्यादा गालियाँ। अब यदि गालियाँ ही हमारे मनोरंजन के लिए ज़रूरी हैं तो फिर नेता कैसे पीछे रह जाएँगे। आख़िर चुनाव का महत्व ही यही है कि उसमें कुछ मनोरंजन हो जाए क्योंकि गम्भीर बातें तो उनके लिये हैं ही नहीं। ज़ोर से चिल्लाएँ, दूसरे की नक़ल मारें और उन्हें कुछ गालियाँ दे दें। काम ख़त्म। गालियों का एक और महत्व है कि हमारे ख़बरिया चैनल उसे ही न्यूज़ मानते हैं। नेता ने गाली दी और चैनल में चलना शुरू हो गया। उससे काम नहीं चला तो फिर कुछ लोगों को शाम में बुला लिया और प्रायोजित ढंग से गालियों पर बातचीत के बहाने फिर गालियाँ शुरू हो गईं। यह एक खतरनाक चलन हैं। गालियों को ख़बरों और भाषण में परोसा जाने लगे तो लोकतंत्र को सुरक्षित समझना सही नहीं होगा। भाषा की मर्यादा किसी भी लोकतंत्र की पहली शर्त है। यह कह देना कि यदि हम सत्ता में आये तो किसी को राज्य या देश छोड़ कर भागना होगा, गाली से भी ज्यादा ख़तरनाक है। इसका क्षणिक महत्व  समर्थकों के मनोरंजन के लिए तो हो सकता है, लेकिन समुदायों के बीच के रिश्ते हमेशा के लिए ख़राब हो सकते हैं। जब किसी भी लोकतंत्र में अपने विरोधी को दुश्मन समझा जाने लगे तो हमें सचेत होना चाहिए। स्टीवन लेविट्स्की एवं ऐंटोनीओ जिब्लाट ने अपनी पुस्तक ‘हाउ डिमॉक्रेसी डाइज़’ में यह चिंता व्यक्त की है कि शायद अमेरिकी लोकतंत्र पहली बार गम्भीर ख़तरे से गुज़र रहा है। उनका मानना है कि यदि राजनीति में  विरोधी दुश्मन दिखने लगे तो समझना चाहिए कि लोकतंत्र ख़तरे में है। यह बात भारत में भी लागू होती है। पिछले कुछ चुनावों से हमारे राजनीतिज्ञ भाषा की मर्यादा भूलते जा रहे हैं। सांकेतिक रूप में ही सही कभी अपने विरोधियों को कुत्ता, तो कभी कुत्ते का पिल्ला कहा जा रहा है।
यह गाली गलौज का दौर है। प्रधानमंत्री गलती से कोई बात नहीं करते। पूरे कार्यकाल में काम से ज्यादा नेहरु परिवार को कोसने में कौन सा श्रुतिनाद है यह समझ से परे है। पिछले सप्ताह जब उन्होंने राजीव गाँधी के हवाले से कांग्रेस पर हमला किया तो उनकी मंशा साफ़ थी। 1984 का सिख नरसंहार चर्चा में लाने के मकसद से दिया गया उनका यह बयान कितने वोट भाजपा को दिलाएगा यह तो 23 मई को पता चलेगा लेकिन अपनी अधकचरी जानकारी के कारण बोफोर्स मुद्दे पर वे खुद ही असहज हुए। कारण यह है कि 2004 में राजग शासन में ही यह मुद्दा हाईकोर्ट में दम तोड़ चुका है और इस मामले की जाँच के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति में शामिल अरुण जेटली खुद राजीव गाँधी को बोफोर्स मामले में क्लीन चिट दे चुके हैं। अब जबकि लोकसभा चुनाव अपने अंतिम चरण व परिणाम की ओर है अमेरिकी साप्ताहिक टाइम ने मुखपृष्ठ पर मोदीजी को विभाजन प्रमुख बताकर मोदीजी के समर्थकों को गाली गलौज का एक और अवसर प्रदान किया जबकि इसी पत्रिका में सरकार की आर्थिक नीति की प्रशंसा भी की गई है। हालत यह हुई कि लेख के लेखक आतिश तासीर की कुंडली खंगालते हुए वाया पाकिस्तान उसे गालियों से नवाजा गया। इस सन्दर्भ में पत्रकार डॉ. दीपक पाचपोर की प्रतिक्रिया को पढ़ना चाहिये। वे लिखते हैं कि  आपका प्रधानमंत्री तो भारत की भद्द पिटवा ही रहा है, गाली देने वाले दुनिया को बता रहे हैं कि हमें ऐसा ही विध्वंसक व विभाजनकारी पीएम चाहिए। हम ऐसे ही पीएम के लायक की जनता हैं। लेखक के पिता वहां के अल्पसंख्यकों (यानि ज्यादातर हिंदू व ईसाई) की रक्षा करने तथा ईश निंदा कानून का विरोध करने में मारे गये! इस कानून का उपयोग अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने के लिए ही होता है। बकौल डॉ. पाचपोर टाइम पत्रिका को इन्होंने मनोहर कहानियां समझा हुआ है। पत्रिका का अपना एक अलग संपादकीय समूह होता है जो बहुत सोच समझ कर लेखों को चुनता है। काफी शोध करता है। उस पर चर्चा होती है और फिर ये तय होता है कि पत्रिका के कवर पेज पर किसको लाया जाए। टाइम के  कवर पेज पर आना बहुत प्रतिष्ठित बात होती है या बहुत सनसनीखेज। वे किसी सरकार के दबाव में नही आते। वे अपने प्रेजिडेंट ट्रम्प का लिहाज नही करते हमारा या किसी और का क्या करेंगे? टाइम के इस लेख की सत्यता मोदी समर्थक खुद ही साबित कर रहे है। अपनी ऊलजलूल दलीलों से कि वो पाकिस्तानी है मुसलमान है। ये टाइम वाले सब प्रतिक्रियाएं पढ़ रहे हैं और उन्हें इसका पक्का विश्वास भी अब हो जाएगा कि जो टाइम पत्रिका के अंदर लेख छपा है उसमे पूरी सत्यता है। क्योंकि रेस्पॉन्स ठीक वैसे ही मिला है कि मोदी के समर्थको के अंदर सहिष्णुता नाम भर की ही है और जो घटनाएं भारत मे हुई है उसकी यही वजह है। समर्थकों ने टाइम के लेख की सत्यता को स्वयं ही सिद्ध कर दिया है। अब बात आतिश तासीर की जिसके बारे में। आतिश तासीर मशहूर पत्रकार तवलीन सिंह के बेटे हैं और उनकी परवरिश दिल्ली में उनके सिख नाना नानी ने की जिनकी खुशवंत सिंह से पारिवारिक मित्रता थी। आतिश के हाथ में बचपन से शिव का गोदना गुदा है और वह सिख धर्म का कड़ा पहनते रहे है जो उनकी नानी ने उन्हें पहनाया था। उनके पिता उन्हें इसलिए नापसंद करते थे कि वह इस्लाम और पाकिस्तान को लेकर इतने बेबाक ढंग से लिखते रहे थे कि अक्सर पाकिस्तानी पॉलिटिक्स में होने के कारण उन्हें दिक्कत होती थी। दिल्ली और लंदन में उनका अधिकतम समय बीतता रहा है। बनारस जाकर उन्होंने संस्कृत सीखी और आतिश तासीर की नवीनतम पुस्तक The Twice Born- Life and death on Ganges  बनारस पर ही केन्द्रित है। आतिश तासीर ब्रिटिश मूल के पत्रकार व उपन्यास लेखक हैं जो मोदी समर्थक भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह और दिवंगत पाकिस्तानी राजनेता सलमान तासीर के बेटे हैं।
जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे तब तक कोई और मुद्दा गाली गलौज के लिए चर्चा में होगा। तब तक आप अन्य मुद्दे जिन पर चर्चा होनी चाहिये वे इस शोर में दबे ही रहेंगे क्योंकि सरकार उन पर चर्चा ही नहीं करना चाहती।