बिसात- कब मिटेगा मसूद का वजूद
05 May 2019
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अजय भट्टाचार्य
करेंट अर्फेयर्स, (05 मई 2019)- पाकिस्तान आधारित आतंकवादी मौलाना मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी घोषित कर दिया, निश्चित तौर पर यह भरत की कूटनीतिक सफलता है और इसके लिए सारे ज़िम्मेदार नेता और अधिकारी बधाई के पात्र हैं। उस दिन प्रधानमंत्री राजस्थान में थे। तुरंत इस घोषणा को लपका और कह डाला कि यह भी आतंक के खिलाफ एक तरह की सर्जिकल स्ट्राइक है। जबकि अजहर मसूद को वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने की कोशिश भारत 2010 से कर रहा था। इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मसूद को ग्लोबल आतंकवादी तो घोषित किया गया है मगर इसलिए नहीं कि उसने भारत पर आतंकी हमला किया है। बल्कि इसलिए कि उसके संबंध अल-क़ायदा से रहे हैं। तालिबान से रहे हैं। इस घटनाक्रम के पार्श्व में और भी बहुत कुछ है लेकिन फ़िलहाल उस पर चर्चा न करना ही उचित है।
जिस आदमी को भारत सरकार ने ने 1994 में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में पकड़ा था। जिसे रिहा कराने के लिए 1995 में कश्मीर से 6 विदेशी सैलानियों का अपहरण उसके साथियों ने किया था और उन सैलानियों की रिहाई के लिए मसूद अज़हर को जेल से छोड़ने की शर्त रखी गई थी, और उसे न छोड़ने पर उन सैलानियों को कभी नहीं छोड़ा गया और उनका आजतक पता नहीं चला। फिर बाद में जिस मसूद अज़हर की रिहाई के लिए 1999 में डेढ़ सौ भारतियों से भरे एक पूरे प्लेन को हाईजैक कर लिया गया, दस दिन तक पूरी दुनिया ने पाकिस्तान से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक तालिबान और कश्मीरी आतंकवादियों की नीचता को लाइव देखा, जिस मसूद अज़हर को ख़ुद भारत के रक्षा मंत्री जसवंत सिंह अपने साथ बैठाकर आतंकियों को सौंपने ले गए, और फिर पिछले 20 सालों से जो आदमी खुलेआम जैश ए मुहम्मद नाम का आतंकवादी संगठन बनाकर कश्मीर में आतंक फैला रहा है, दुनिया को उस आदमी को आतंकवादी कहलवाने में हमें 20 साल लग गए। बात ध्यान रखिए आज दुनिया ने 25 साल बाद उसे सिर्फ़ आतंकवादी माना है, इससे सिर्फ़ यही होगा कि उसके आतंकवादी संगठन “जैश ए मुहम्मद” को फ़ंड मिलने पर पाबंदी लग जाएगी, उसके ऑफ़िस बंद हो जाएँगे। इससे बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, पहले वो “हरकत उल अंसार” नाम से संगठन चलाता था, अब किसी और नाम से संगठन खोल लेगा। संयुक्त राष्ट्र द्वारा मसूद को आतंकी मानने से हमें एक कामयाबी तो मिली है लेकिन यह बहुत छोटी कामयाबी है, असली कामयाबी तब मिलेगी जब हमारे देश की अदालत उसे फाँसी पर चढ़ाए या हमारी सुरक्षा एजेंसियों के लोग उसे गोली से उड़ाएँ। ध्यान रहे 1993 की 12 मार्च को मुंबई को दहलाने वाले दाऊद इब्राहीम को भी अक्तूबर 2003 में ग्लोबल आतंकवादी घोषित किया जा चुका है। मगर वह अब भी पाकिस्तान में आजाद और सुरक्षित है।
►मोदी का गूढ़ सन्देश
इस बार जौनपुर से भाजपा प्रत्याशी के. पी. सिंह को लेकर क्षेत्र में जो चर्चाएँ हैं वे उनके लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती हैं। पिछले दिनों प्रतापगढ़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रचार सभा थी। सामान्यत: प्रधानमंत्री अपनी जनसभा में आस-पास के सभी प्रत्याशियों का नाम लेकर उनके लिए जनता से मत देने की अपील करते हैं लेकिन उस रैली में मोदीजी ने सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, अमेठी सहित आसपास के अन्य लोकसभा क्षेत्रो का नाम लिया लेकिन जौनपुर का नाम नही लिया। पता चला है कि मोदीजी जौनपुर लोकसभा सीट से दोबारा बीजेपी की उम्मीदकारी के. पी. सिंह को नही देना चाहते थे। क्योंकि जौनपुर लोकसभा क्षेत्र की आम जनता के साथ साथ पार्टी पदाधिकारी औऱ कार्यकर्ता भी सांसद से बहुत नाराज थे। सांसद केपी सिंह भी पिछले 5 साल से लापता थे। इस तरह की शिकायत मिलने से मोदीजी काफी नाराज थे औऱ जौनपुर लोकसभा से किसी दूसरे को टिकट देना चाहते थे। लेकिन फिर से टिकट पाने के लिए के. पी. सिंह ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी एवं सीएम योगी जी से पैरवी शुरू की, जब वहां से भी उन्हें कोई जवाब नही मिला तो उनकी माता जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय पहुंची। उन्होंने संघ मुख्यालय में धरना देने की धमकी दी औऱ अपने परिवार को वर्षो से संघ से जुड़े होने की बात कही। खबर है कि संघ के एक बड़े पदाधिकारी से उन्होंने अपने बेटे को फिर टिकट दिए जाने की शिफारिश की। नतीजा यह हुआ कि संघ के हस्तक्षेप के चलते के. पी. सिंह टिकट तो पा गए लेकिन मोदीजी की नाराजगी को दूर नहीं कर पाये । जानकार बताते हैं कि उनको अच्छी तरह ज्ञात है कि जौनपुर की जनता वर्तमान सांसद केपी सिंह से बहुत नाराज है। बताते हैं कि इस नाराजगी की दूसरी बड़ी वजह के. पी. सिंह का बडबोलापन है। उन्होंने कहीं यह टिप्पणी की थी कि वे भाजपा के बूते नहीं बल्कि अपने दम पर चुनाव जीते थे। प्रतापगढ़ की रैली से मोदीजी ने कोई गूढ़ सन्देश तो जौनपुर को दे ही दिया है।
►चौकीदार बनाम चौकीदार
वाराणसी से पहले निर्दलीय और बाद में महागठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर उभरे सीमा सुरक्षा बल के बर्खास्त जवान तेज बहादुर का परचा ख़ारिज को गया है। बताया जाता है कि जब तक तेज बहादुर निर्दलीय थे तब तक भाजपा नेतृत्व उनको गंभीरता से नहीं ले रहा था, लेकिन 29 अप्रैल को जैसे ही सपा प्रत्याशी के तौर पर तेज बहादुर ने परचा दाखिल किया सत्ता का तंत्र भी सक्रिय हुआ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दो दिन तक वाराणसी में डेरा डाल दिया। सोनापुरा में तंत्र के साथ इनकी बैठक हुयी थी और एक मई को बनारस से राम राज्य परिषद के प्रत्याशी श्रीभगवान के साथ-साथ महागठबंधन के प्रत्याशी तेज बहादुर सहित लगभग 56 लोगों के नामांकन रद्द कर दिए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें कांग्रेस प्रत्याशी की भी भूमिका बताई जा रही है। वाराणसी से छनकर आ रही खबरों के अनुसार सभी प्रत्याशियो के नामांकन की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी थी फिर भी किसी विशेष प्रभाव में लगभग 56 लोगों का नामांकन रद्द कर दिया गया। चुनाव आयोग की इस कार्रवाई के विरोध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज अनशन पर बैठे हैं। उनका सीधा आरोप है कि चुनाव आयोग के सारे अधिकारी सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं। कही कोई सुनवाई नही हो रही है। उनका कहना है कि सबको अगले दिन 11 बजे तक का समय दिया था अपनी बात कहने के लिए लेकिन हास्यासपद बात यह है कि 11 बजे से तो जिलाधिकारी की चुनावी कार्यवाही ही शुरू होती है तो फिर रात भर में कोई प्रत्याशी अपनी बात किसको और कहाँ जा कर बताता। उनकी सारी शिकायतों में एक प्रश्न मार्के का है कि पूरे देश भर में एक भी भाजपा प्रत्याशी का पर्चा रद्द हुआ है क्या?
►चाय, पानी और चुनाव
देश भर में राजनितिक तापमान अपने चरम पर है। सोशल मीडिया से लेकर जमीन और चुनावी मैदान में परस्पर विरोधी समर्थक भिड़े हुए मिल जायेंगे। पिछले सोमवार को चौथे चरण के मतदान के दौरान मुंबई के एक कांग्रेस प्रत्याशी के बूथ एजेंट और पोलिंग एजेंट इस बात को लेकर दिन भर परेशान रहे कि उनके पास खाना-पानी तक की व्यवस्था नहीं थी। मगर राजनीतिक शत्रुता से परे शिवसेना का कार्यकर्ताओं ने उन कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को न केवल चाय पानी उपलब्ध कराया बल्कि पूरे दिन उनकी हर जरुरत का ध्यान रखा। जिन बड़े पदाधिकारियों पर इन कार्यकर्ताओं के सुख सुविधा की जिम्मेदारी थी वे प्रत्याशी से मोटी रकम लेकर अपने एसी कमरों में बैठ चुनावी जीत की शाब्दिक जुगाली करते रहे।
पुछल्ला- अरविंद केजरीवाल पर रोड शो के दौरान फिर थप्पड़ बरसे हैं। पार्टी मानती है कि इससे उसका वोट और मजबूत होता है। आप कह सकते हैं कि तुम क्या जानो एक थप्पड़ की कीमत बाबु! वोट के लिए थप्पड़ अच्छे हैं।