बिसात- न घर के न घाट के
28 Apr 2019
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करेंट अर्फेयर्स, (28 अप्रैल 2019)- राजनीति में निपटने और निपटाने की सांकेतिक भाषा होती है। समय बदलने से व्यक्ति की जरूरतें और अपेक्षाएं भी बदल जाती हैं। इसलिए इसे समय के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। राजनीति में यह प्रयोग समझने के लिए गजब का पैनापन चाहिये। यह तय करना मुश्किल होता है कि कहाँ रुकना है और कब चलना है। हर नेता जीवन के अंत तक 'कुर्सी' पर बने रहना चाहता है। दिंडोरी के निवर्तमान भाजपा सांसद हरिश्चंद्र चव्हाण के मामले में भी ऐसा ही हुआ। जब नासिक और डिंडोरी में 'गठबंधन ’के उम्मीदवारों के प्रचार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक बैठक पिंपलगांव (बी) में हुई थी, तो चव्हाण मंच पर मौजूद थे। पिछले पांच साल मोदी, जिनके साथ संसद में थे उन्होंने चव्हाण की और देखना भी गवारा नहीं समझा जबकि पिछले 15 साल से चव्हाण यहाँ के सांसद हैं। इसके उल्ट मोदी मंच पर शिवसेना सांसद हेमंत गोडसे के कंधे पर हाथ रखे आगे बढ़े। इस बार चव्हाण का टिकट कटकर डॉ. भारती प्रवीण पवार को मैदान में उतारा गया है। मंच पर चव्हाण की उपेक्षा से यह तय हो गया है कि अब भाजपा में उनकी उपयोगिता समाप्त हो गई है। भाजपा डिंडोरी की उम्मीदवारी पर चिंतन की नाराजगी की पृष्ठभूमि पर भी कुछ चिंता व्यक्त कर रही है। लेकिन में चव्हाण को मंच पर भाषण देने का मौका देकर मतदाताओं के बीच भ्रम को दूर करने का मौका था। जैसा दिलीप गांधी को नगर में बोलने की अनुमति दी गई थी; लेकिन पिंपलगांव (बी) की बैठक में चव्हाण से परहेज किया गया। भाजपा ने उन्हें अब रोकने का फैसला किया है। बताया जाता है उम्मीदवारी न मिलने से नाराज चल रहे चव्हाण ने शुरू में संकेत दिए थे कि वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन शायद वे हिम्मत नहीं जुटा पाए। प्रश्न यह है कि आखिर उनके टिकट कटने का कारण क्या था? इसके पीछे आदिवासी क्षेत्र में सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाकर चव्हाण ने पार्टी के मंत्री विष्णु सवारा के प्रति अपनी निराशा व्यक्त की थी। जब उनका टिकट कट गया तब उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्होंने स्वास्थ्य शिविर के लिए संरक्षक मंत्री गिरीश महाजन को सीधे वित्तीय सहायता प्रदान नहीं की, इसलिए उनकी उम्मीदवारी को नकार दिया गया। वैसे इस नाराजी का नतीजा चुनाव परिणाम पर क्या पड़ेगा यह तो वक्त ही बतायेगा। फ़िलहाल चव्हाण की स्थिति न घर के न घाट के जैसी हो गई है।
►किसका होगा रायगड
पिछले सोमवार को जब तीसरे चरण का मतदान हो गया तब से महाराष्ट्र की रायगड लोकसभा सीट के भावी नतीजे को लेकर अजीब सी ऊहापोह का मंजर है। शिवसेना के अनंत गंगाराम गीते पिछली बार यहाँ से जीते थे। तब उनके सामने राष्ट्रवादी कांग्रेस के बड़े नेता सुनील दत्तात्रय तटकरे महज 2110 मतों से चुनाव हारे थे। हार की वजह का विश्लेषण करने पर पता चला कि उनके सामने एक और सुनील सखाराम तटकरे बतौर निर्दलीय चुनाव लड़े थे और 9700 वोट पाकर सुनील दत्तात्रय तटकरे की जीत में रुकावट बने थे। इस बार भी वही स्थिति है। 10वीं फेल सुनील सखाराम तटकरे के अलावा कक्षा 9 तक पढ़े सुनील पांडुरंग तटकरे भी रत्नागिरी से रायगड आकर ताल ठोंक चुके है। समान नाम-उपनाम से अनंत गीते भी बचे नहीं और उनके सामने अनंत पद्मा गीते ने भी नामांकन किया था लेकिन बाद में उनको समझाबुझा कर बिठा दिया गया। पिछले चुनाव में अनंत गंगाराम गीते को 396178 और सुनील दत्तात्रय तटकरे को 394068 मत मिले थे जबकि शेतकरी कामगार पक्ष के रमेशभाई कदम को 129730 मत मिले थे। इस बार शेकाप मैदान में नहीं है जिसके कारण गीते की नींद उडी हुई है। इस लोकसभा क्षेत्र की 6 विधान सभा सीटों में 3 पर शिवसेना, 2 पर राकांपा और एक पर शेकाप का कब्ज़ा है। किसी भी कीमत पर यह सीट फिर से जीतने की कोशिश के तहत शिवसेना ने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत अब्दुल रहमान अंतुले के बेटे नावेद को शिवसेना में प्रवेश भी करा दिया लेकिन इस बार पेंच ज्यादा उलझा हुआ है।
►बाटी चोखा दे न धोखा
चुनावी मौसम में हर राजनीतिक दल अपने पक्ष में मतों का ध्रुवीकरण करने के लिए भांति-भांति के प्रयोग करते रहे हैं। मुंबई में उत्तर भारतीय मतदाताओं की जनसंख्या को देखते हुए लाई-चना, खिचड़ी से लेकर बाटी-चोखा के प्रयोग होते रहे हैं। इस बार भरी धूप में बाटी चोखा का दौर चला है। सवाल यह है कि जिस पार्टी ने उत्तर भारतीय मतदाताओं के मत हासिल करने के लिए बाटी-चोखा दावतें आयोजित कीं उस पार्टी ने मुंबई और ठाणे में एक भी उत्तर भारतीय को लोकसभा चुनाव लड़ने योग्य नहीं समझा। जबकि पार्टी में कद्दावर उत्तर भारतीय चेहरों की कमी नहीं है हां यह अलग बात है कि उन्हें आपसी टांग खिंचाई से ही फुर्सत नहीं है।
►भड़के निरुपम
मुंबई में कांग्रेस के केंद्रीय चुनाव पर्यवेक्षक आशीष दुआ एक दलित नेता के साथ उत्तर-पश्चिम लोकसभा क्षेत्र के कांग्रेस प्रत्याशी संजय निरुपम के कार्यालय पहुंचे तो उस दलित नेता को देखते ही निरुपम की त्योरियां चढ़ गईं। निरुपम ने दुआ से कहा कि आप एक गद्दार को लेकर न घूमें खासकर मेरे चुनाव क्षेत्र में इस नेता की कोई जरुरत नहीं है। केंद्रीय पदाधिकारी के सामने निरुपम की यह टिप्पणी व व्यवहार पार्टी कार्यकर्ताओं को नागवार गुजरा है। वैसे इस घटनाक्रम से एक खेमा खुश भी है। उसे लगता है अंदरूनी कलह से अगर निरुपम यह चुनाव हार गए तो उन्हें अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए बहुत ज्यादा जूझना पड़ेगा। खासकर तब जबकि लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस छोडकर भाजपा में गए एक नेता की घर वापसी की अटकलें ज्यादा तेज हों। यह नेता 2009 में उत्तर-पश्चिम लोकसभा क्षेत्र में पड़ने वाले एक विधान सभा क्षेत्र का कांग्रेस से प्रतिनिधित्व भी कर चुका है। 2014 में अपनी सीट गंवाने के बाद वः भाजपा में तो शामिल हो गया लेकिन राजनीतिक गोत्र की छुआछूत के कारण अब भी भाजपा में सहज नहीं हो पा रहा है।
पुछल्ला- प्रधान सेवक नरेंद्र मोदी के अराजनीतिक साक्षात्कारों की श्रंखला में अक्षय कुमार और आज तक की चौकड़ी के बाद अब किसका नंबर है, शर्माजी यही सोचकर अदालत लगाने वाले हैं।