सरोकार- मज़बूरी का नाम नरेंद्र मोदी !

 28 Apr 2019  539

अजय भट्टाचार्य

पॉलिटिक्स, (28 अप्रैल 2019)- भारतीय जनता पार्टी का वर्तमान नेतृत्व कांग्रेस से कितनी भी नफरत कर ले लेकिन वोटों की राजनीति के लिए उसे कांग्रेस से प्रतीक लेने की बेशर्मी करनी ही पड़ती है। वाराणसी में 25 अप्रैल को रोड शो के जरिये अपने राजनीतिक बाहुबल का प्रदर्शन शुरू करने से पहले महामना मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उनके चरणों में शीश नवाते प्रधानसेवक को देखना उनकी राजनीतिक मजबूरी के दर्शन कराता है। अन्यथा पानी पी-पी कर कांग्रेस और कांग्रेस के हर नेतृत्व को कोसने वाले प्रधानसेवक को चार-चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष रहे महामना के सामने नतमस्तक नहीं होना पड़ता। क्योंकि उन्हें मालूम है कि महामना की पूजा करके क्षेत्र विशेष में मतों की फसल कैसे उगाई जा सकती है।  उनका यही और इसी प्रकार का प्रेम मोहनदास करमचंद गाँधी और सरदार वल्लभ भाई पटेल को लेकर भी है। पटेल के साथ कथित कल्पित दुर्व्यवहार की कहानियां कहने/गढ़ने के भी मन्तव्य किसान मतदाता को प्रभावित करना भर है। हर चुनाव में पटेल और गाँधी की याद इसी राजनीतिक मजबूरी का नाम नरेंद्र मोदी है। कैसे? इसे समझने के लिए मोदीजी नीत भाजपा जिसके प्रतीकात्मक अध्यक्ष अमित शाह हैं की हाल के पांच वर्षों में किये गए राजनीतिक समझौते समझने होंगे। जम्मू-कश्मीर में धुर अलगाववाद समर्थक पार्टी के साथ मिलकर सत्ता में साझेदारी इसी प्रकार की मजबूरी का सशक्त उदाहरण है। इन दिनों भाजपा ब्रांड राष्ट्रवाद पर सवार हो चुनावी समर में उतरे नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी जब असम में बोडो लिबरेशन टाइगर से अलग होकर बने बोडो पीपल्स पार्टी से फिर गलबहियां करते हैं जिसकी मूल विचारधारा वामपंथ पर आधारित है, तब सत्ता की मजबूरी समझी जा सकती है।  पूर्वोत्तर में पैठ बनाने के लिए झुकने की सभी सीमायें तोड़ उन गुटों से समझौते किये जो क्षेत्र में उग्रवाद के लिए जाने जाते हैं। इसकी मिसाल मणिपुर में देखने को मिली है। इसी महीने की शुरुआत में खबर प्रसारित हुई थी कि मणिपुर के उग्रवादी संगठन कुकी नेशनल आर्मी ने लोगों को भाजपा के पक्ष में वोट करने के लिए धमकायाहै। कुकी नेशनल आर्मी ने मणिपुर के ग्राम प्रधानों को धमकी दी थी कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को 90 फीसदी वोट मिलना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे लोगों को बुलवाकर उन्‍हें सजा देंगे। दरअसल, डी मुनतफई और मोरेह गांव में कुकी नेशनल आर्मी के कमांडर थांगबोई हाओकिप ने एक सभा आयोजित की थी, जिसमें ग्राम प्रधान भी मौजूद थे। इस सभा में मणिपुर आउटर सीट पर भाजपा उम्मीआदवार एचएस बेंजामिन मेट का जिक्र करते हुए कमांडर ने कहा कि उन्हें चुनाव में 90 प्रतिशत मतदान चाहिए, अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह हिंसा का सहारा लेंगे। कमांडर ने चेतावनी देते हुए कहा कि जो भी आदेश का पालन नहीं करेगा, उसे बख्शाह नहीं जाएगा। मजेदार बात यह है कि एच एस बेंजामिन को टिकट भी इसी संगठन की पहल पर मिला। फरवरी में इस संगठन ने भाजपा नेतृत्व  से अनुरोध किया था कि पार्टी मणिपुर संसदीय सीट के लिए उनके पसंदीदा उम्मीसदवार को टिकट दे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्याक्ष अमित शाह को पत्र लिखकर केएनके समेत कई संगठनों ने भाजपा की मणिपुर ईकाई के उपाध्याक्ष एचएस बेंजामिन मेट के लिए टिकट मांगा था। 1988 में थांगखोलुन हाओकिप की कमान में गठित कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन और कुकी नेशनल आर्मी में कैडर के पहले बैच को म्यांमार में काचिन इंडिपेंडेंट आर्मी द्वारा प्रशिक्षित किया गया था। 600 कैडरों की ताकत वाले इस संगठन के पास एके-सीरीज़, जी-सीरीज़, एम-सीरीज़ और 60 एमएम मोर्टार जैसे कई खतरनाक हथियार हैं। इससे भाजपा के राष्ट्रवाद को समझा जा सकता है।
दरअसल यह चुनाव भाजपा विरुद्ध कांग्रेस व अन्य राजनीतिक दलों से कहीं ज्यादा मोदी विरुद्ध मोदी हो चला है। इसकी वजह यह है कि भाजपा पर सवार मोदीजी ने 2014 में भारत के जिस कल्पनातीत परिवर्तन की हुंकार भरी थी उसका गुब्बारा पांच साल बीतते-बीतते फट गया है और इसीलिए अब विकास के मुद्दे पर पार्टी चर्चा नहीं कर रही है। चुनाव का सारा विमर्श कथित कल्पित राष्ट्रवाद पर केंद्रित करने की प्रक्रिया में मोदीजी और उनकी पार्टी जी-जान से लगी है लेकिन सत्य इससे बिलकुल अलग है। इस सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश के सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी हरिचरण प्रकाश ने लिखा है-  
“मुझे नहीं पता कि किसकी सबसे ज्यासदा सीटें आएंगी। मैं नहीं जानता कौन सी पार्टी सरकार बनाएगी। मुझे ये भी नहीं पता कि मेरी लोकसभा में सीट कौन निकाल रहा है। इस चुनाव का मुझे ‘च’ भी नहीं समझ आ रहा क्योंेकि लोग ‘’च्च्सभा   ’’ तक नहीं कर रहे। भयंकर सन्नानटा है टीवी और मोबाइल के बाहर की दुनिया में। मेरे पास किसी सवाल का जवाब नहीं है। केवल एक बात मैं तयशुदा तौर पर महसूस कर रहा हूं और काफी ठोकने बजाने के बाद अब कहने की स्थिति में हूं। इसे सनद रख लें। बाद में काम आएगी। 
यह चुनाव न भाजपा के लिए निर्णायक है, न कांग्रेस के लिए और न ही किसी दूसरे दल के लिए। यह चुनाव जनता के लिए भी निर्णायक नहीं है, न ही देश के लिए। यह चुनाव केवल और केवल राष्ट्रीरय स्वययंसेवक संघ के लिए निर्णायक है। जीत किसी की भी हो, यह चुनाव ‘’सांस्कृऔतिक संगठन’’ आरएसएस के ताबूत में आखिरी कील साबित होने जा रहा है। जिसे पैराडाइम शिफ्ट कहते हैं, उसका गवाह बन रहा है ये चुनाव। मुहावरा पलट गया है- कभी कहते थे कि बिना संघ के भाजपा कुछ नहीं है, आज की हकीकत ये है कि भाजपा है तो संघ है। संघ ने पूरी तरह भारतीय जनता पार्टी के धनबल और नेतृत्वी-प्रभाव के सामने आत्मैसमर्पण कर दिया है। ऐसा अनजाने नहीं हुआ, संघ के शीर्ष स्तटर पर स्वेृच्छाश से लिया गया सचेतन निर्णय है। भाजपा ने अपना खज़ाना खोल दिया है। संघ के काडरों का मुंह खुला हुआ है। साइकिल से चलने वाला प्रचारक फॉर्चूनर पर आ गया है। सांसद प्रत्या शी के इर्द-गिर्द घूम रहा है। सुविधाभोगी हो गया है। झण्डे वालान परिसर में जाकर देखिए समझ आ जाएगा, संघ के मुंह में पैसे का खून लग चुका है। अब वह परदे के पीछे काम करने वाला सांस्कृ तिक संगठन नहीं रह गया है। आज का प्रचारक सामने खुलकर, आरएसएस लिखी टीशर्ट पहनकर, देसी चेग्वांरा बना फिर रहा है। उसे समझ में आ चुका है कि बिना उत्पाहदन किए जिंदगी कैसे हरामखोरी से काटी जाती है। अब यह सिलसिला रुकने वाला नहीं। यह संघ को ले डूबेगा। आप अपने क्षेत्र की शाखाओं और प्रचारकों के साथ एकाध भाजपा उम्मीयदवारों के प्रचार में टहल आइए, आपका नतीजा इससे उलट नहीं होगा। 2014 के बाद सत्ता‍ की राजनीति और मातृ संगठन की विचारधारा के बीच जो टकराव शुरू हुआ था, वह अब मुकम्म2ल हो चुका है। अब संघ का काडर पेड प्रचारक है। इसका असली परिणाम देखना हो तो 2022 तक दम थामे रखिए। अब तक भाजपा वाले कांग्रेस में जाते दिखे हैं, कल संघ का प्रचारक वहां जाएगा जहां उसकी सही कीमत लगेगी। एबसर्ड के थिएटर में केवल एक विचारधारा खतरे में नहीं होती, सभी होती हैं। सामाजिक निष्ठाी का लोप सारे वैचारिक संगठनों को ले डूबता है। संघ अपवाद नहीं होना चाहिए।“ 
अब मोदीजी की गांधीजी के प्रति निष्ठा पर चिंतन करिए। इस सन्दर्भ में इसी चुनावी अभियान में मोदीजी की एक अप्रैल को वर्धा में हुयी रैली के बाद अख़बारों में छपी सेवाग्राम आश्रम प्रतिष्ठान के न्यासी अविनाश काकड़े की प्रतिक्रिया जान लीजिये। काकड़े के अनुसार, 'गांधी सत्य में विश्वास करते थे जबकि मोदी सत्ता हथियाने के लिए झूठ बोलने और झूठ का इस्तेमाल करने में यकीन करते हैं। गांधी अहिंसा के पैरोकार थे जबकि मोदी हिंसा में विश्वास करते हैं।
वर्धा में रैली करने पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर महात्मा गांधी का मजाक उड़ाने का आरोप लगाते हुए सेवाग्राम आश्रम न्यास की तरफ से एक बयान सामने आया जिसमें गांधी और मोदी को दो अलग-अलग ध्रुव बताया गया। दरअसल न्यास का कहना है कि वर्धा आए पीएम मोदी सेवाग्राम नहीं पहुंचे, ऐसा करके उन्होंने महात्मा गांधी का मजाक उड़ाया है। उल्लेखनीय है कि 1936 में महात्मा गांधी ने वर्धा के बाहरी इलाके में सेगांव नामक एक ग्राम में इस सेवाग्राम की स्थापना की थी। न्यास के बयान के मुताबिक ‘वो गांधी से बड़े हो गए, गांधी की जरूरत नहीं!’: काकड़े ने कहा, ‘लगभग एक दशक तक सेवाग्राम राष्ट्रपिता का आवास स्थल रहा है। सोमवार (1 अप्रैल) को विदर्भ में इस शहर में आए मोदी ने अपना कार्यक्रम एक चुनावी रैली संबोधित करने तक ही सीमित रखा। हो सकता है, पिछले पांच सालों में उन्होंने (मोदी) यह सोचना शुरू कर दिया हो कि वो गांधी से बड़े हो गए हैं और गांधी की जरूरत ही नहीं है।’‘ गांधी अहिंसा में भरोसा करते थे, मोदी हिंसा में’ उन्होंने कहा, ‘गांधी और मोदी अपने विचारों और कृत्य में अलग-अलग ध्रुव हैं, मोदी के शासनकाल में झूठ देश में सर्वोपरि हो गया है और उनका सेवाग्राम नहीं आना गांधी की सत्य की वकालत का मजाक उड़ाने जैसा है। गांधी सत्य में विश्वास करते थे जबकि मोदी सत्ता हथियाने के लिए झूठ बोलने और झूठ का इस्तेमाल करने में यकीन करते हैं। गांधी अहिंसा के पैरोकार थे जबकि मोदी हिंसा में विश्वास करते हैं।’ 
समझा जा सकता है कि महामना की प्रतिमा के सामने नतमस्तक मोदीजी यदि मालवीयजी के जीवन से ही कुछ सीख सकें तो यह उनकी मालवीयजी के प्रति श्रद्धा का सटीक प्रस्फुटन होगा। क्योंकि भारतमाता की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वाले इस महामानव ने जिस विश्वविद्यालय की स्थापना की उसमें उनकी परिकल्पना ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षित करके देश सेवा के लिये तैयार करने की थी जो देश का मस्तक गौरव से ऊँचा कर सकें। वे केवल उपदेश ही नहीं दिया करते थे अपितु स्वयं उनका पालन भी किया करते थे। वे अपने व्यवहार में सदैव मृदुभाषी रहे। कर्म ही उनका जीवन था। अनेक संस्थाओं के जनक एवं सफल संचालक के रूप में उनकी अपनी विधि व्यवस्था का सुचारु सम्पादन करते हुए उन्होंने कभी भी रोष अथवा कड़ी भाषा का प्रयोग नहीं किया। आज मोदीजी ने देशभक्ति के नाम पर जो जमात खड़ी की है उसकी भाषा महामना को गाली देने जैसी है क्योंकि महामना ने अपने वैचारिक विरोधियों को भी समुचित आदर दिया। निश्चित ही तब मोदीजी को अक्षय कुमार को साक्षात्कार देने से लेकर आज तक की मंडली के साथ अनौपचारिक होकर सहज, सरल, सकारात्मक होने का अभिनय नहीं करना पड़ेगा।