अजय भट्टाचार्य
पॉलिटिक्स, (21 अप्रैल 2019)- हिन्दू-मुस्लिम, देशभक्ति, पुलवामा, उरी और बालकोट एयर स्ट्राइक के बाद भी मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश नाकाम होने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर हिंदुत्व की आड़ में मतों को झटकने की कोशिश के तहत भोपाल लोकसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी ने मालेगांव बम धमाकों की आरोपी और फ़िलहाल जमानत पर रिहा साध्वी प्रज्ञा ठाकुर उम्मीदवार बनाकर इस लोकसभा सीट के चुनाव का रोमांच बढ़ा दिया है। भोपाल के बहाने भाजपा पूरे देश में यह माहौल बनाने की कोशिश कर रही है कि भगवा आतंकवाद के बहाने पूर्ववर्ती सरकारें हिन्दुओं को प्रताड़ित करती रही हैं। यह अलग बात है कि इससे पहले साध्वी ने कभी भोपाल के मुद्दों को लेकर अपनी आवाज बुलंद नहीं की है, अब कट्टर हिंदूत्व के बलबूते अपनी राजनीति का आरम्भ कर रही है। साध्वी ने हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश के तहत अपने ऊपर पुलिस हिरासत में हुई ज्यादती का जिक्र करते-करते यह भी कह दिया कि उनके शाप के कारण ही इस मामले के जाँच प्रमुख हेमंत करकरे आतंकवादियों के हाथों मौत का शिकार हुए। जब इस बयान की हर तरफ निंदा हुयी तब सबसे पहले भाजपा ने साध्वी के बयान से किनारा किया और मामला फंसता देख साध्वी ने अपना बयान वापस भी ले लिया। दरअसल गिरफ्तारी में उत्पीड़न की दुखभरी दास्तान सुनाकर साध्वी धार्मिक आधार पर मतों के ध्रुवीकरण का सिलसिला आगे बढ़ाना चाहती थी/है।
पुलिसिया जुल्म की जो कहानी साध्वी ने पेश की है उसे मुंबई उच्च न्यायालय और देश की शीर्ष अदालत पहले ही ठुकरा चुकी है। इस सन्दर्भ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने आर. एस. खैरे के नेतृत्व में एक समिति गठित की थी जिसमें सीआईडी अधिकारी जे. एम. कुलकर्णी, सतर्कता समिति सदस्य रश्मि जोशी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। 2015 में इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में साध्वी पर किसी भी प्रकार की शारीरिक यातना की बात से इंकार किया गया है। यहाँ तक कि 2008 में दो अलग-अलग अस्पतालों में साध्वी की जाँच की गई थी लेकिन उनके शरीर पर किसी भी तरह की मारपीट के निशान नहीं पाए गये थे। इसके बाद अदालत में पेश हुई साध्वी ने भी इस विषय पर चुप्पी साध ली थी।
साध्वी प्रज्ञा के बारे में एक बड़ा सच यह है कि हत्या के एक मामले में उनकी पहली गिरफ्तारी कांग्रेस नहीं बल्कि मध्य प्रदेश में भाजपा शासन में हुई थी। तब राज्य के मुख्यमंत्री थे शिवराज सिंह चौहान और मामला था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक सुनील जोशी की हत्या का। सुनील जोशी की इंदौर के पास देवास में हुई हत्या का आरोप साध्वी प्रज्ञा समेत 8 लोगों पर लगा था। साध्वी को को गिरफ्तार किया गया था। राजनीति की विवशता देखिये कि अब शिवराज सिंह साध्वी प्रज्ञा के लिए कह रहे हैं कि ‘उनका जन्म देश को सुरक्षित रखने के लिए हुआ है।‘ महत्वपूर्ण यह भी है कि जोशी मामले में साध्वी ने किसे शाप दिया था? क्या हुआ था सुनील जोशी हत्या केस में?
सुनील जोशी 29 दिसंबर, 2007 को देवास में मारे गए थे। उनका नाम मक्का मस्जिद, समझौता और मालेगांव विस्फोट मामलों में लिया गया था। इस मामले में देवास पुलिस ने प्रज्ञा ठाकुर और दूसरे लोगों को 23 अक्टूबर, 2008 को गिरफ्तार किया था। बाद में देवास पुलिस अधीक्षक के आदेश पर 25 मार्च, 2009 को यह मामला बंद कर दिया गया। सुनील जोशी पर समझौता ब्लास्ट केस में शामिल होने के आरोप थे। नई दिल्ली से लाहौर जाने वाली समझौता एक्सप्रेस ट्रेन में पानीपत के पास 18 फरवरी, 2007 को हुए धमाके में 68 लोग मारे गए थे। मरने वालों में ज्यादातर पाकिस्तानी नागरिक थे। इस केस में सुनील जोशी का नाम भी आरोपियों की सूची में शामिल था। उनका नाम राष्ट्रीय जाँच एजेंसी अर्थात एनआईए द्वारा दाखिल आरोपपत्र में था।
एक वेब समाचार साईट वायर के मुताबिक सुनील जोशी की हत्या के मामले की बंद फाइल कुछ दिन बाद एक बार फिर से खोल दी गई। मध्य प्रदेश पुलिस ने 9 जुलाई, 2010 को एक बार इस मामले की जांच करने का फैसला लिया और कोर्ट में आरोपपत्र दाखिल किया। इसमें मध्य प्रदेश पुलिस ने कहा कि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और उनके चार साथियों ने ही सुनील जोशी की हत्या की है। उसके मुताबिक इन लोगों को डर था कि समझौता ब्लास्ट केस और अजमेर में हुए बम धमाके के केस में सुनील जोशी मुंह खोल सकते हैं और इससे उनकी पूरी साजिश का भंडाफोड़ हो सकता है।
इस आरोपपत्र के आधार पर पुलिस ने 26 फरवरी, 2011 को साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ अदालत से गिरफ़्तारी वारंट हासिल किया। मगर यह बात और है कि साध्वी प्रज्ञा उस वक्त मालेगांव बम धमाकों में गिरफ्तार हो महाराष्ट्र की जेल में थीं। इस दौरान मध्य प्रदेश पुलिस ने इस मामले के दूसरे आरोपियों को राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के दूसरे शहरों से गिरफ्तार किया। बाद में इंदौर हाईकोर्ट ने इस केस की जांच एनआईए को सौंप दी। सुनील जोशी की हत्या के मामले में मध्य प्रदेश पुलिस ने 432 प्रष्ठों का आरोपपत्र मजिस्ट्रेट पद्मेश शाह की अदालत में दाखिल कर आरोप लगाया कि सुनील जोशी की हत्या इन लोगों ने की थी। उनके मुताबिक इसके पीछे मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का भय था। इनका यह डर बताया गया था कि सुनील जोशी की गिरफ्तारी से देश के कई हिस्सों में हुए विस्फोटों में शामिल लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
एक निजी चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक आरोप पत्र में यह भी उल्लेख था कि प्रज्ञा ठाकुर के साथ सुनील जोशी ने निजी तौर पर ऐसी बदसलूकी की थी, जिसे कोई भी महिला सहन नहीं कर सकती थी। इसमें 124 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। प्रज्ञा ठाकुर, आनंद राज कटारिया, हर्षद सोलंकी, वासुदेव परमार, रामचंद्र पटेल, मेहुल और राकेश के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर इन पर हत्या, आपराधिक साजिश और आर्म्स एक्ट के आरोप लगाए गए।
रिपोर्ट के मुताबिक सुनील जोशी की हत्या की एक और वजह यह थी कि सुनील जोशी देवास में हर्षद, मेहुल, राकेश और उस्ताद के साथ छिपा था। इन चारों के साथ सुनील जोशी अक्सर दुर्व्यवहार करता था। इन सबके नाम वडोदरा के बेस्ट बेकरी मामले में आए थे। बेस्ट बेकरी में 1 गुजरात दंगों के वक्त 14 लोग जिंदा जला दिए गए थे।
आरोपपत्र के अनुसार सुनील जोशी की हत्या वाले दिन साध्वी प्रज्ञा ठाकुर इंदौर में थीं। उनके मोबाइल रिकॉर्ड से पता चला था कि वह हत्या के दूसरे आरोपियों के संपर्क में थीं। जोशी की हत्या के बाद प्रज्ञा ठाकुर संदिग्धों में सबसे ऊपर थीं। उसके रिश्तेदारों ने बताया था कि हत्या वाले दिन वह उनके घर आई थीं और अपना सूटकेस लेकर चली गई थीं। प्रज्ञा ठाकुर को उस अस्पताल में भी देखा गया था, जहां सुनील जोशी का शव लाया गया था। 2014 के मई महीने में नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में सत्ता में आई। इसके तीन महीने बाद 19 अगस्त, 2014 को यह मामला एक बार फिर देवास जिला अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया। सितंबर, 2015 में देवास कोर्ट ने 8 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए। साध्वी प्रज्ञा पर हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप लगा। बाद में 1 फरवरी, 2017 को एडीजे राजीव कुमार आप्टे ने इस केस में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। सुनील जोशी हत्याकांड से साध्वी भले छुट गई हो लेकिन जलगाँव ब्लास्ट मामले में वह अब भी आरोपी है। हिंदुत्व का यह न्य चेहरा भाजपा के लिए कितना सहायक सिद्ध होगा यह भविष्य की गर्त में छिपा है लेकिन जब हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का ढिंढोरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पीट रहे हों तब साध्वी का राजनीतिक अवतार सरकार की नीयत पर शक करने की वजह पैदा करता है।