सरोकार -धारा 124-ए के निहितार्थ

 07 Apr 2019  552

अजय भट्टाचार्य

पॉलिटिक्स, (07 अप्रैल 2019)-देश में इन दिनों देशद्रोह से सम्बंधित धारा 124-ए को लेकर गर्मागर्म राजनितिक बहस चल रही है। जैसे ही कांग्रेस ने इस धारा को कानून से निरस्त करने का आश्वासन अपने घोषणापत्र में किया है भारतीय जनता पार्टी ने अपने बहुप्रचारित देशप्रेम और देशभक्ति के फार्मूले को हिट करने के लिए इसे लपकते हुए कांग्रेस पर हमलावर होते हुए यह साबित करने की कोशिश की है कि कांग्रेस देशद्रोहियों के साथ खड़ी पार्टी है। लेकिन 2015 में इसी धारा के तहत जब केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली के खिलाफ झाँसी की महोबा अदालत ने स्वयं संज्ञान लेते हुए देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था तब इस कानून और धारा को गलत साबित करने के लिए जेटली इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण में पहुंचे थे और उच्च न्यायालत ने जेटली को निराश नहीं किया था। जेटली पर देशद्रोह का मुकदमा ख़ारिज हुआ और उस मजिस्ट्रेट जिसने यह मुकदमा जेटली पर दर्ज कराया था, उसे निलंबित कर दिया गया। अब यह समझिये कि जेटली पर देशद्रोह की धारा के तहत मुकदमा हुआ क्यों था? 
दरअसल 2014 में सत्तारूढ़ होते ही केंद्र सरकार ने न्यायपालिका पर शिकंजा कसने के लिए 99वां संविधान संशोधन करते हुए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया था। इस आयोग के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट सहित अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार सरकार अपने पास रखना चाहती थी। इस आयोग में भारत के प्रधान न्यायाधीश  (सीजेआई) इसके अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठ न्यायाधीश इसके सदस्य होंते। केंद्रीय कानून मंत्री को इसका पदेन सदस्य बनाए जाने का प्रस्ताव था। दो प्रबुद्ध नागरिक जिनका चयन प्रधानमंत्री, प्रधान न्यायाधीश और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सहित तीन सदस्यों वाली समिति करती, उन्हें भी आयोग में रखा जाता। लोकसभा में विपक्ष का नेता न होने की स्थिति में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को चयन समिति में रखा जाता। आयोग को लेकर विवाद के कारण सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं। मामले में याचिकाकर्ता ने आयोग में कानून मंत्री की मौजूदगी पर भी सवाल उठाते हुए  कहा था कि भ्रष्ट सरकार भ्रष्ट न्यायपालिका चाहेगी और भ्रष्ट जजों की नियुक्ति करेगी। नेताओं को जजों की नियुक्ति में शामिल नहीं होना चाहिए। नेताओं के हितों का टकराव हमेशा रहता है और यह सिस्टम पूरी न्यायपालिका को दूषित करेगा।
दरअसल सरकार उस प्रणाली को खत्म करना चाहती थी जिसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण का निर्धारण एक कोलेजियम व्यवस्था के तहत होता रहा है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। यह प्रक्रिया वर्ष 1993 से लागू थी। इसके तहत कोलेजियम सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति की अनुशंसा करता था। यह सिफारिश विचार और स्वीकृति के लिए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भेजी जाती थी। इस पर राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद संबंधित नियुक्ति की जाती थी। इसी प्रकार उच्च न्यायालय के लिए संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कोलेजियम से सलाह मशविरे के बाद प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजते थे। फिर देश के प्रधान न्यायाधीश के पास यह प्रस्ताव जाता था। बाद में इसे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पास विचार और स्वीकृति के लिए भेजा जाता था। इस पर राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद सम्बंधित नियुक्ति की जाती थी।
सर्वोच्च न्यायालय ने 16 अक्टूबर 2015 को संविधान के 99वें संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम को 'असंवैधानिक' करार देते हुए इसे निरस्त कर दिया और उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पुरानी कॉलेजियम प्रणाली को बहाल कर दिया। सर्वोच्च अदालत के इस फैसले पर जेटली ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था, “The Indian democracy cannot be a >tyranny of the unelected and if the elected are undermined, democracy itself would be in danger.”
अर्थात भारतीय लोकतंत्र अनिर्वाचित लोगों के जुल्म का शिकार नहीं हो सकता और यदि निर्वाचित लोगों को कमतर माना जायेगा तो लोकतंत्र खुद खतरे में होगा। जेटली के इसी बयान को महोबा के तात्कालिन सिविल जज (जूनियर डिविजन) अंकित गोयल ने देशविरोधी मानते हुए पुलिस को जेटली के खिलाफ भादवि की धारा 505 (सार्वजनिक शांति के खिलाफ अपराध या विद्रोह का कारण बनने के इरादे से प्रसारित गलत बयान) तथा 124-ए (देशद्रोह) का मुकदमा दर्ज करने और जेटली को अदालत में हाजिर होने का आदेश दिया था। इससे समझा जा सकता है कि अंग्रेजों द्वारा अस्तित्व में आई धारा 124-ए किस तरह किसी सामान्य बयानबाजी को भी देशद्रोह का आरोपी बनाने के लिए सक्षम हथियार है जिसका दुरूपयोग कांग्रेस सहित सभी सरकारें करती आई हैं।
आप कल्पना करें कि टी20 विश्व कप में भारत अगर पहले ही दौर में बाहर हो जाए और इससे निराश क्रिकेट प्रेमी पोस्टरों के साथ विरोध प्रदर्शन करें जिससे हुड़दंग मच जाए तो क्या उन्हें या टीम के खिलाड़ियों को देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा हो सकती है? किसी को भी यह सवाल बेतुका लग सकता है। लेकिन भारत में अपराधों को लेकर सजा का निर्धारण करने वाली सबसे बड़ी किताब यानी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की  धारा 124-ए के तहत ऐसा किया जा सकता है। क्रिकेट प्रेमियों को सजा देने के लिए तर्क यह दिया जाएगा कि उनके पोस्टरों पर लिखी बातों से लोगों का गुस्सा भड़का जिससे हुड़दंग मचा। इसी तरह खिलाड़ियों के खिलाफ यह तर्क दिया जा सकता है कि वे यदि हारते नहीं तो लोग इस तरह की तख्तियां नहीं बनाते और बवाल भी नहीं खड़ा होता। दरअसल आईपीसी की धारा 124ए को लेकर बनाए गए प्रावधान इतने ही अस्पष्ट हैं कि इनकी आड़ लेकर लोगों को आसानी से देशद्रोह का आरोपी बनाया जा सकता है।
ऐसे ही अस्पष्ट प्रावधानों के चलते देश की सबसे बड़ी अदालत ने आईटी एक्ट की धारा 66ए को निरस्त कर दिया था। उसके बाद कई लोगों ने सवाल किया था कि क्या आईपीसी की धारा 124ए के साथ भी ऐसा ही नहीं होना चाहिए। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आजादी के पहले से लेकर अब तक इस धारा के तहत बहुत से लोगों को इन्हीं अस्पष्ट प्रावधानों की आड़ में गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें सामाजिक कार्यकर्ता, नेता, आंदोलनकारी, पत्रकार, अध्यापक और छात्र तक शामिल हैं। सार्वजानिक मंचों पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार 
आईपीसी की धारा 124ए कहती है कि अगर कोई भी व्यक्ति भारत की सरकार के विरोध में सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गतिविधि को अंजाम देता है जिससे देश के सामने सुरक्षा का संकट पैदा हो सकता है तो उसे उम्रकैद तक की सजा दी जा सकती है। इन गतिविधियों का समर्थन करने या प्रचार-प्रसार करने पर भी किसी को देशद्रोह का आरोपी मान लिया जाएगा। इन गतिविधियों में लेख लिखना, पोस्टर बनाना और कार्टून बनाना जैसे वे रचनात्मक काम शामिल हैं जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी आधार हैं।
हालांकि 1962 में आया सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला धारा 124ए के दायरे को लेकर कई बातें साफ कर चुका है, लेकिन तब भी इस धारा को लेकर अंग्रेजों वाली जमाने की रीत का पालन ही किया जा रहा है। माना जाता है कि तब आईपीसी में देशद्रोह की सजा को शामिल करने का मकसद ही सरकार के खिलाफ बोलने वालों को सबक सिखाना था। 1870 में वजूद में आई यह धारा सबसे पहले तब चर्चा का विषय बनी जब 1908 में बाल गंगाधर तिलक को अपने एक लेख के लिए इसके तहत छह साल की सजा सुनाई गई। तिलक ने अपने समाचार पत्र केसरी में एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था- देश का दुर्भाग्य। 1922 में अंग्रेजी सरकार ने महात्मा गांधी को भी धारा 124 ए के तहत देशद्रोह का आरोपी बनाया था। उनका अपराध यह था कि उन्होंने अंग्रेजी राज के विरोध में एक अखबार में तीन लेख लिखे थे। तब गांधी जी ने भी इस धारा की आलोचना करते हुए इसे भारतीयों का दमन करने के लिए बनाई गई धारा कहा था। आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहर हाल नेहरू ने भी कहा था कि अगर उनकी चले तो वे इस धारा को खत्म कर दें।
जानकारों का तर्क है कि जब संविधान की धारा 19 (1)ए में पहले से ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीमित प्रतिबंध लगे हुए हैं तब 124ए की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा धार्मिक उन्माद फैलाने, सामाजिक द्वेष पैदा करने, शांति व्यवस्था बिगाड़ने और किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने जैसे गलत कामों के लिए आईपीसी में पहले से ही अलग-अलग धाराओं में सजा निश्चित की गई है। माना जाता है कि इसके बावजूद धारा 124ए को सिर्फ इसलिए बरकरार रखा गया है ताकि इसकी आड़ में उन लोगों पर नकेल लगाई जा सके जो सरकार के खिलाफ अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं।
महाराष्ट्र सरकार ने 2012 में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को संसद भवन का कार्टून बनाने के चलते के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। तब कानूनविदों ने कहा था कि असीम त्रिवेदी के खिलाफ कार्रवाई करनी ही थी तो वह 'इंसल्टिंग ऑफ नेशनल ऑनर ऐक्ट' के तहत की जा सकती थी। इस एक्ट के तहत देश के सम्मान सूचक चिन्हों को अपमानित करने संबंधी गतिविधि के लिए सजा दिए जाने का प्रावधान है। चौतरफा आलोचना झेलने के बाद दबाव में आई सरकार ने बाद में ऐसा किया भी।
धार्मिक उन्माद फैलाने, सामाजिक द्वेष पैदा करने, शांति व्यवस्था बिगाड़ने और किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने जैसे गलत कामों के लिए आईपीसी में पहले से ही अलग-अलग धाराओं में सजा निश्चित की गई है।
इस धारा का विरोध करने वाले लोग एक और तर्क देते हैं. कहा जाता है कि किसी भी लोकतंत्र में नागरिकों को मिलने वाला सबसे बड़ा अधिकार ही असहमति का अधिकार होता है। यानी अगर किसी को लगता है कि उसके देश की व्यवस्था में कुछ खामियां हैं तो वह उनका विरोध कर सकता है। लेकिन इस विरोध को देशप्रेंम की कसौटी पर तौलते हुए लोगों पर देशद्रोह का आरोप मढ़ने के मामले देखे जाते रहे हैं गुजरात दंगों पर गुजरात सरकार की आलोचना करते एक लेख के लिए तत्कालीन राज्य सरकार ने 2008 में समाजशास्त्री आशीष नंदी के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया था। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने इस पर सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए उसके इस फैसले को हास्यास्पद बताया था। छत्तीसगढ़ में सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन और उत्तर प्रदेश में पत्रकार सीमा आजाद के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। 2012 में हरियाणा के हिसार में कुछ दलितों पर भी देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया था। उनका कसूर यह था कि वे दबंगों के जुल्म की शिकायत करते हुए डीएम दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे थे। 22 दिन के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने मुख्यमंत्री का पुतला जलाया था। इसके बाद उन पर 124ए लगा दी गई। आपको जानकर हैरानी होगी कि देशद्रोह के आरोप में देश भर में दर्ज मामलों में सर्वाधिक 72 प्रतिशत मामले झारखण्ड और बिहार के किसानों व वनवासियों पर दर्ज किये गये हैं। देशद्रोह के अधिकांश मामले अदालतों में ठहर नहीं पाते लेकिन इनका शिकार हुए लोग ताउम्र एक दर्दभर अनुभव जरुर पाते हैं। ताजा मामला निर्मलक्का का है।
नक्सली होने के संदेह में जिस निर्मलक्का को पुलिस ने 12 साल पहले गिरफ्तार कर किया था उसे अदालत के आदेशपर जगदलपुर केंद्रीय कारागार से बीते बुधवार को रिहा कर दिया गया। पुलिस ने 157 मामले में निर्मलक्का और उसके पति चन्द्रशेखर रेड्डी को साल 2007 में गिरफ्तार किया था। सबूतों के अभाव में चंद्रशेखर को न्यायालय से पहले ही रिहा कर दिया गया था। वहीं निर्मलक्का को जेल में ही रखा गया। सभी मामलों में सबूतों और गवाहों के बयान के आधार पर निर्मलक्का के खिलाफ जुर्म साबित न होने पर दंतेवाड़ा अदालत ने 2 अप्रैल को रिहाई का आदेश दिया था।  हद यह है कि जेल में होने के बावजूद  निर्मलक्का के खिलाफ वर्ष 2007, 2008, 2014 और 2015 में भी नए-नए मामले दर्ज होते रहे, लेकिन किसी में भी अपराध साबित नहीं हो पाया। 
सवाल यह है कि जिस कानून के गलत उपयोग से जेटली जैसे नेता नहीं बच सके उसकी पैरवी करने में भाजपा का स्वार्थ क्या है?