लोकसभा चुनाव 2019 का चुनाव धीरे-धीरे पकड़ रहा है जोर

 01 Apr 2019  555

►उपलब्धियों से संबंधित सवाल पूछने पर आता हैं गुस्सा

देश विदेश, (01 अप्रैल 2019)- लोकसभा चुनाव का ज्वार धीरे-धीरे जोर पकड़ रहा है और यह लगभग तय है कि उपलब्धियों के नाम पर सरकार के पास बताने के लिए कुछ खास नहीं है। यही कारण है कि जब भी सरकार के काम-काज मांगने की बात आती है तब सरकार या सरकार से जुड़े संगठन के पदाधिकारी निहायत ही घटिया स्तर पर उतरकर मारपीट की मुद्रा में आ जाते हैं। ताजा घटना पिछले सप्ताह की है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में आयोजित एक लोकल न्यूज चैनल के डिबेट शो में भाजपा जिलाध्यक्ष विजेंद्र कश्यप अपना आपा खो बैठे। डिबेट के दौरान एक किसान नेता अरुण राणा की टिप्पणी पर इस प्रकार नाराज हुए कि उन्होंने अपना जूता निकाला और उन्हें पीटने के लिए दौड़ पड़े। पिछले बुधवार को शहर के मिशन कंपाउंड पार्क में एक डिबेट आयोजित किया गया था। इस डिबेट शो में तमाम राजनीतिक दलों के लोग भी पहुंचे हुए थे। डिबेट में कश्यप ने दावा यह किया था कि प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दबाव की वजह से 60 फीसदी से अधिक किसानों की बकाया धनराशि चीनी मीलों ने भुगतान कर दिए हैं। इसके जवाब में भारतीय किसान यूनियन से जुड़े अरुण राणा ने तुरंत टोकते हुए कहा, “मेरे पास गन्ना विभाग के आंकड़े मौजूद हैं। जिनके मुताबिक बीते दो सालों में सिर्फ 15 फीसदी गन्ना किसानों का बकाया भुगतान किया गया। बस यही बात बीजेपी नेता को नागवार गुजरी, जिसके बाद उन्होंने अपने पैर से एक जूता निकालते हुए कुर्सी से उठे और राणा की तरफ हमलावर होकर बढ़ चले। बीजेपी नेता द्वारा वाद विवाद में मात्र अपने ऊपर टिपण्णी सुनकर किसान नेता पर भड़क उठना उचित नहीं है। देखा जाये तो उनकी पार्टी में ही इस प्रकार का प्रचलन है। अक्सर यह देखा जाता है की जब भी मौजूदा सरकार के सामने उनके कामो की सच्चाई रखी जाती है तो पार्टी उसे स्वीकार करने से इंकार कर देती है। मोदी सरकार अक्सर अपने विफलताओं के आकड़े देश की जनता के सामने आने से रोकती है। इसके बहाने सरकार अपनी सच्चाईयों पर पर्दा डालने की कोशिश करती है। अब बात यह आती है कि आखिर कब तक सरकार अपने झूठे वादे के सहारे देश की जनता को गुमराह करती रहेगी। अक्सर ही देखा गया है जब कोई भाजपा सरकार की विफलताओं या सच्चाई को सामने रखने की कोशिश करते है तो सरकार उग्र व्यवहार अपना लेती है। लेकिन सरकार का यह रवैय्या ज्यादा दिनों तक नहीं चलने वाला है। चुनाव करीब है और धीरे धीरे लोग मौजूदा सरकार की विफलताओं को पहचान चुके हैं। जिसके कारण आने वाले चुनाव में सरकार को कठिनाइयों का सामना कर पड़ सकता है। उपरोक्त प्रकरण की रौशनी में समझा जा सकता है कि प्रधान सेवक इन दिनों हर चुनावी रैली में चौकीदार के साथ-साथ भारत-पाक तनातनी, एयर स्ट्राइक, पुलवामा की सवारी कर देशप्रेम और देशभक्ति की वियाग्रा का डोज क्यों दे रहे हैं? भावनात्मक मुद्दे उठाकर देश के मूल मुद्दों की अनदेखी कर प्रधानसेवक भले चुनाव जीत लें लेकिन देश जरुर हार जायेगा क्योंकि जिस खुशहाली की तस्वीर वे पेश कर रहे हैं उसके पीछे एक ठगा हुआ भारत सहमा सा खड़ा है। चलिए सर्जिकल स्ट्राइक पर ही आइये। बोल बहादुर प्रधान सेवक सभा में सीना फुलाते हुए जब यह कहते पूछते हैं कि कमजोर सरकार चाहिये या मजबूत सरकार तब पता नहीं किस डर से यह नहीं बताते कि 27 फरवरी को देश की वायु सेना का एक हेलीकॉप्टर भी ध्वस्त हुआ था और उसमें देश के छह जवान शहीद हुए थे। जानते हैं उस हेलीकॉप्टर को क्यों जमीन पर आना पड़ा? क्योंकि जिस तरह का युद्धोन्माद उस समय उस दिन था उसी में अपनी ही एक मिसाइल ने उस हेलीकॉप्टर को ध्वस्त कर दिया और हमारे 6 वायुसैनिक अपनी ही सैन्य रणनीति का शिकार हो गए। न ही किसी चैनल ने कभी इस विषय पर कोई बहस कराने की सोची। बस अभिनंदन को लेकर मीडिया दौड़ पड़ी और फिर मुद्कारों से देश गूंजने लगा कि मोदी है तो मुमकिन है। अंग्रेजी अख़बार इकोनोमिक टाइम्स ने 29 मार्च के अपने अंक में प्रकाशित किया है कि वडगाम में एमआई-17 वी 5 हेलीकॉप्टर गिरने से कुछ समय पहले ही भारतीय वायु रक्षा मिसाइल दागी गई थी।ध्वस्त हुए एमआई-17 हेलीकॉप्टर का महत्वपूर्ण ब्लैक बॉक्स, फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर अभी तक लापता है। भारतीय वायुसेना की तरफ से ब्लैक बॉक्स की तलाश की जा रही है। भारतीय वायु सेना के सूत्रों का कहना है कि हेलीकॉप्टर के गिरने  के बाद ब्लैक बॉक्स का पता नहीं चल रहा है। हम लोग इसका पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं। संभव है कि इसे देश विरोधी स्थानीय लोग लेकर चले गए हों। वे लोग विमान के कई अन्य पुर्जे भी लेकर जा चुके हैं। घटना वाले दिन उस समय पाकिस्तान की वायुसेना की तरफ से हवाई हमला किया गया था। हालांकि, भारत ने पाकिस्तान की तरफ से किए गए इस हमले को विफल कर दिया था। इससे पाकिस्तान अपने तय लक्ष्य को निशाना नहीं बना सका था। एमआई-17  का ब्लैक बॉक्स का मिलना बहुत महत्वपूर्ण है जिससे कि हादसे के के पहले की घटना के बारे में सिलसिलेवार जानकारी मिल सकेगी। इससे हादसे से ठीक पहले की विस्तृत जानकारी मिल सकेगी। हाल ही में मिराज-2000 के दुर्घटनाग्रस्त होने की जानकारी का पता उसके ब्लैक बॉक्स के फ्रांस में खुलने के बाद हुई थी। भारतीय वायुसेना के इस हेलीकॉप्टर ने श्रीनगर से उड़ान भरी थी। सुबह 10 बजे यह विमान अपनी नियमित उड़ान पर था। हेलीकॉप्टर करीब 10 बजकर 10 मिनट पर बड़गाम के गिरकर ध्वस्त हो गया था। हेलीकॉप्टर में सवार सभी छह एयरफोर्स कर्मियों की मौत हो गई थी। इस हादसे की जांच के लिए कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के आदेश दिए थे। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि इसके उड़ान भरने के तुरंत बाद श्रीनगर की तरफ से एयर डिफेंस मिसाइल दागी गई थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि जांच इन दोनों घटनाओं की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रही है। इस मामले में भारतीय वायुसेना के अधिकारियों का कहना है कि दुर्घटना के कारणों की जांच अभी जा रही है। अभी तक दुर्घटना के वास्तविक कारणों का पता नहीं लग पाया है। ईटी की रिपोर्ट के अनुसार यह भी देखा जा रहा है कि उस समय आईएफएफ सिस्टम काम कर रहा था या नहीं। आईएफएफ का अर्थ यह पता लगाने की प्रणाली कि मित्र या शत्रु चिन्हित करना। दागी गई मिसाइल इजरायल में बनी थी।अब सरकार को गुस्सा दिलाने वाली एक और महत्वाकांक्षी योजना की बात करें जिसे  मोदी जी देश के गरीब आदमी के स्वास्थ्य के लिए वरदान बताते हुए थकते नहीं हैं। आयुष्मान भारत योजना को प्रधानसेवक ने छत्तीसगढ़ जाकर लांच किया था कि कुछ चुनावी लाभ मिल सके। मगर यह योजना शुरू होते ही तब विवादों में फंस गई जब लाभार्थियों में गरीबों के स्थान पर बड़े लोगों के नाम सामने आये।
प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई आयुष्मान भारत योजना की अभी शुरुआत ही हुई है कि लाभ पाने वालों की लिस्ट में बड़ी गड़बड़ी सामने आने लगी है.यह इस योजना को सिर्फ जरूरमंदों को इलाज में सहायता पहुंचाने के लिए शुरू किया गया था मगर इस योजना में उत्तर प्रदेश  की  योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री सतीश महाना के पूरे परिवार को आयुष्मान योजना के लाभार्थी के तौर पर दर्शा दिया गया। इस सूची में सतीश महाना सहित उनकी पत्नी अनीता महाना एवं करन महाना, राधिका, जाह्वनी तथा नेहा का नाम शामिल था।  मंत्री और उनके परिवार का नाम कानपुर नगर की सूची में सरकारी नौकर शाहों ने शामिल किया गया था। बाद में ये सभी नाम हटाये गये।पिछले महीने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में आयुष्मान योजना पर एक सेमिनार हुआ।  सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस योजना और इसकी क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए है। उनका मानना है कि आयुष्मान योजना निजी क्षेत्र को सार्वजनिक धन देने के आधिकारिक तरीके का रास्ता है। एम्स में 'लाइफ इन इंडिया: फैक्ट एंड आइडिया' पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने इस योजना को पुरानी शराब की नई बोतल बताया है। गरीब लोगों के बीमार होने का क्या कारण है, यहां तक कि इस मुद्दे पर विचार ही नहीं किया गया है। यह योजना निजी क्षेत्र में सार्वभौमिक धन बाँटने का एक माध्यम है। किसान बीमा योजना पहले ही निजी बीमा कंपनियों को फायदा पहुँचाने वाली योजना के रूप में सामने आ चुकी है।
इसी तरह सरकार को तब भी बहुत गुस्सा आयेगा और आता है जब उससे स्मार्ट सिटी के बारे में पूछा जाता है। देशभर में कुल 100 स्मार्ट सिटी बनाने का पीएम मोदी का बहुचर्चित स्मार्ट सिटी मिशन दम तोड़ता नजर आ रहा है, सच्चाई से ज्यादा जुमला दिख रहा है। कुल 2,03,172 करोड़ रूपये के इस प्रोजेक्ट को चार वर्षों में मात्र सात फीसदी यानि 14,882 करोड़ रूपये ही केन्द्र सरकार दे पाई है। मौके पर इस धनराशि का नाममात्र ही उपयोग हुआ। प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी द्वारा जून 2015 में पूरे देश में सौ स्मार्ट सिटी के मिशन की घोषणा करने के बाद सरकार यह जानना भी भूल गई कि जमीनी स्तर पर कोई काम चल भी रहा है या नहीं। कहने का अर्थ यह है कि पांच साल सत्ता में पूरे कर रही सरकार अब भी विपक्ष से काम-काज का हिसाब मांग रही है इसका सीधा अर्थ है की वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान उपलब्धियों के नाम पर देश को भ्रमित करने में लगा है।