नई दिल्ली।
स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने के लिए राज्यों द्वारा नामांकित 100 शहरों के लिए शीर्ष 20 में जगह बनाना आसान काम नहीं है क्योंकि विभिन्न मानकों की कसौटियों पर खरा उतरने के साथ साथ यह भी महत्वपूर्ण होगा कि ये शहर कहां स्थित है। शहरी विकास मंत्रालय के लिए भी इन 100 में से 20 शहरों को चुनना आसान काम नहीं होगा। उसे हर पांच में से केवल एक शहर को चुनना होगा।
स्मार्ट सिटी योजना के तहत पहले वर्ष सभी कसौटियों पर खरे उतरने वाले केवल 20 शीर्ष शहरों को ही इस योजना में शामिल किया जाएगा। सरकार ने अभी ऐसा कोई फार्मूला नहीं बनाया है, जिसमें एक राज्य से दो या उससे अधिक शहरों को चुने जाने से रोका जा सके। यदि एक राज्य से पांच शहर शीर्ष पर आ जाते हैं तो उस स्थिति में क्या निर्णय लिया जाएगा।
सरकार के सामने एक और बड़ी समस्या यह है कि स्मार्ट सिटी की कसौटी पर खरा उतरने के लिए महत्वपूर्ण मानक कचरा प्रबंधन की सुविधा 36 में से केवल 22 राज्यों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों में ही है।
14 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में कचरा प्रबंधन या शोधन के संयंत्र नहीं हैं और नामांकित किए गए 100 शहरों में से ज्यादातर इन्हीं राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में ही हैं।
आबादी के लिहाज से सबसे बड़ा राज्य होने के कारण उत्तर प्रदेश को 13 स्मार्ट शहर मिले हैं लेकिन इसमें कचरा प्रबंधन की ठोस व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा बिहार तथा कर्नाटक में भी कचरा प्रबंधन सुविधा नहीं है। इन तीनों राज्यों में से 21 शहरों को स्मार्ट शहर के रूप में विकसित करने के लिए नामांकित किया गया है।
कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में भारत में अभी ज्यादा काम नहीं हुआ है और देशभर में अभी कचरे से खाद बनाने के 279 पारंपरिक संयंत्र , 138 वर्मी कंपोस्ट संयंत्र, 172 बायो मिथनेशन और कचरे से ऊर्जा बनाने वाले 8 संयंत्र हैं। गंभीर बात यह है कि इनमें से भी कई या तो क्षमता के अनुसार काम नहीं कर रहे हैं या बंद हैं। कचरे से खाद बनाने वाले पारंपरिक संयंत्रों में से लगभग 75 प्रतिशत तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश और केरल तीन राज्यों में ही है।
स्मार्ट शहरों की सूची का आकलन करने से पता चलता है कि इनमे से कई प्रस्तावित मालवहन गलियारों के निकट हैं, जिससे इन्हें अन्य शहरों की अपेक्षा पहले प्राथमिकता मिल सकती है। पंजाब में लुधियाना-जालंधर से लेकर हरियाणा की करनाल से फरीदाबाद की पट्टी और राजस्थान, गुजरात तथा महाराष्ट्र के शहरों को इसका फायदा मिल सकता है। इन शहरों को दिल्ली- मुंबई औद्योगिक गलियारे का लाभ मिल सकता है। इन शहरों के प्रतिनिधि निवेशकों को पैसा लगाने के लिए आसानी से राजी कर सकेंगे। जो शहर इन गलियारों के निकट नहीं है, उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
स्मार्ट शहर के रूप में विकसित किए जाने के लिए चुने गए 100 शहरों को अगले तीन महीनों में स्मार्ट सिटी की उनकी अवधारणा के अनुसार अपनी योजना का खाका पेश करना होगा। सरकार ने उन्हें इसके लिए प्रशिक्षण के साथ साथ दो करोड़ रूपए की राशि भी दी है। शहरों की योजनाओं को बुनियादी तथा अत्याधुनिक सुविधाओं, लोगों के जीवन स्तर, कचरा प्रबंधन, परिवहन, राजस्व व्यवस्था आदि कसौटियों पर परखा जाएगा।
स्मार्ट शहरों के रूप में विकसित किए जाने वाले 20 शहरों के लिए पहले वर्ष 200-200 करोड़ और फिर पांच वर्ष तक हर वर्ष 100 -100 करोड़ रूपए की राशि जारी की जाएगी। दूसरे वर्ष में 40 और तीसरे वर्ष में बाकी 40 शहरों को स्मार्ट शहर के रूप में विकसित करने के लिए चुना जाएगा। केन्द्र सरकार ने इसके लिए 48000 करोड़ रूपए की राशि का प्रावधान किया है और राज्यों को भी इतनी ही राशि जुटानी होगी। राज्यों के लिए यह राशि जुटाना भी बड़ी चुनौती होगी।