केबिनेट का फैसला, सरकार करेगी दस हजार टन दाल आयात

 21 Sep 2015  1111
नई दिल्ली।
सरकार ने दालों की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर पांच हजार टन अरहर और इतनी ही मात्रा में उड़द दाल आयात करने का निर्णय लिया है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की मंगलवार को हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया।
 
सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी एमएमटीसी दालों का आयात करेगी। आयातित दाल की पहली खेप मुंबई में पांच सितंबर तक पहुंच जाएगी । इसके साथ ही सरकार ने वर्ष 2006 से 2011 के दौरान चार सरकारी कम्पनियों को दालों के आयात तथा उसकी बिक्री से हुए नुकसान की भरपाई के लिए 113.40 करोड़ रुपए जारी करने की मंजूरी दी ।
 
राष्ट्रीय कृषि सहकारिता विपणन महासंघ(नैफेड) प्रोजेक्ट एंड इक्विपमेंट कारपोरेशन, स्टेट ट्रेङ्क्षडग कारपोरेशन और मेटल एंड मिनरल ट्रेङ्क्षडग कारपोरेशन को दालों की बिक्री से नुकसान की भरपाई के लिए यह राशि जारी की गई है ।
 
उल्लेखनीय है कि अरहर दाल की कीमत बाजार में 150 रुपये किलो तक पहुंच गई है । सरकार ने विशेषकर प्याज और दालों की कीमतों पर नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर इनका आयात शुरु किया है ।
 
तेल क्षेत्र के लिए नई नीति मंजूर
सरकार ने तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम(ओएनजीसी) और आयल इंडिया लिमिटेड (ओआईएल) द्वारा खोज गए छोटे हाइड्रोकार्बन क्षेत्र के लिए सीमांत क्षेत्र नीति (एमएफपी) को आज मंजूरी दे दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की बैठक में लिये गये इस फैसले से तेल एवं गैस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका बड़े पैमाने पर बढऩे की उम्मीद है।
 
मंत्रिमंडल की बैठक के बाद तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने संवाददाताओं को बताया कि नई नीति के तहत 69 तेल क्षेत्रों को रखा गया है। उन्होंने बताया कि इन क्षेत्रों में विभिन्न कारणों से प्राप्त तेल का दोहन नहीं हो पाया था।
 
उम्मीद है कि इस नीति से इन क्षेत्रों में तेल दोहन के काम में तेजी आयेगी। उन्होंने बताया कि ये तेल क्षेत्र ओएनजीसी और ओआईएल के पास कई वर्षो थे और इनका दोहन नहीं हुआ था। नई नीति के तहत इन्हें प्रतिस्पर्धी निविदा के लिए खोला जायेगा और उम्मीद है कि तीन माह में ये काम पूरा हो जायेगा। इन तेल क्षेत्रों में 70 हजार करोड़ रूपये मूल्य का भंडार है।
 
इन नीति के तहत तेल दोहन कंपनियां इन क्षेत्रों में तेल उत्पादन के लिए निविदा करने के सक्षम होंगी। इससे पहले इन क्षेत्रों को विकसित नहीं किया जा सका था क्योंकि इन्हें सीमांत क्षेत्र माना जा रहा था और इसलिए प्राथमिकता नहीं दी गयी थी। नई नीति के बाद इन क्षेत्रों में उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।