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* निर्णय के सात महीने बाद भी कार्यवाही नहीं
अनिता शुक्ला
मुंबई, (10 जनवरी 2019)- साल 1975 में आपातकाल के दौरान मिसाबंदियों के द्वारा किए गए जनसंघर्ष के लिए राज्य सरकार ने मिसाबंदियों का सम्मान करने का निर्णय 2 जुलाई 2018 को लिया था। लेकिन सात महीने बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा लिए गए निर्णय की अनदेखी होने का खुलासा हुआ है। हाल ही में सामने आई जानकारी के मुताबिक, मिसाबंदियों को उनका मासिक मानधन देने की कार्यवाही राज्य के जिलाधिकारियों द्वारा शुरू करने का निर्देश दिया गया था। जिसके मुताबिक जिलाधिकारियों को अपने- अपने जिले की सूची राज्य सरकार को भेजना था। लेकिन जो सात महीने बीत जाने के बाद भी नहीं हो पाया। इस मामले में जिन लोगों ने लापरवाही की है, उनके खिलाफ "दफ्तर दिरंगाई कानून" के तहत कारवाई करने की मांग की जा रही है।
गौरतलब है कि देश में 25 जून 1975 से 31 मार्च 1977 के बीच में आपातकाल की घोषणा हुई थी, जिसके विरोध में देश में कई लोगों ने लंबी और बड़ी लड़ाई लड़ी थी, और विरोध करने वाले इन लोगों को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा था। आपातकाल के दौरान जिन लोगों ने संघर्ष किया था, उन लोगों को न्याय देने के लिए सीएम फडणवीस ने 2 जनवरी 2018 को मंत्रिमंडल की बैठक में मिसाबंदियों को पेंशन देने की योजना को मंजूरी दी थी, जिसके तहत राज्य के महसूल मंत्री चंद्रकांतदादा पाटील की अध्यक्षता में एक मंत्रीमंडल की उपसमिति गठित की गई, जिसमें भूतपूर्व कृषीमंत्री दिवंगत भाऊसाहेब फुंडकर, राज्य के अन्न पुरवठा मंत्री गिरीश बापट, राज्यमंत्री मदन येरावार को शामिल किया गया था। इस समिति ने 2 जुलाई 2018 को बैठक लिया, जिसमें मिसाबंदियों को सम्मान के तौर पर मासिक धन देने का तय किया।
निर्णयानुसार एक महीने से भी ज्यादा कारावास भोगने वालों को दस हजार रूपये या फिर उनकी पत्नी को पांच हजार रूपये, जबकि एक महीने से कम का कारावास भोगने वालों को हर महीने पांच हजार रूपये या फिर उनकी पत्नी को ढ़ाई हजार रूपये दिए जाने की सिफारिस की गई थी। जिसके लिए राज्य सरकार ने 42 करोड़ रूपये की राशि की उपलब्धतता की, लेकिन जिलाधिकारियों द्वारा संबंधित जिले की सूची राज्य सरकार के पास नहीं भेजने के कारण यह निर्णय भी कागजों पर धरा का धरा रह गया।
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